रांचीःझारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक बार फिर सरना धर्म कोड को लेकर राजनीति गर्म कर दी है। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और झारखंड के राज्यपाल को जातिगत जनगणना में सरना धर्म कोड को शामिल करने की मांग की है। देश और राज्य के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे तीनों प्रमुख शख्सियतों को अलग-अलग तरह से मुख्यमंत्री ने चिट्ठी लिखकर बताया है कि कैसे सरना धर्म कोड आदिवासियों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है।
माननीय प्रधानमंत्री आदरणीय श्री @narendramodi जी को पत्र लिखकर समस्त झारखंडवासियों की ओर से अपने पूर्व के वर्ष 2023 के आग्रह, माननीय झारखंड विधानसभा के संकल्प, आदिवासी समाज की भावना तथा झारखंड राज्य की आकांक्षा को ध्यान में रखते हुए जनगणना के द्वितीय चरण के लिए निर्धारित किए जाने… pic.twitter.com/b4u4olT80u
— Hemant Soren (@HemantSorenJMM) May 3, 2026
मुख्यमंत्री ने राज्यपाल संतोष गंगवार को लिखी चिट्ठी में लिखा है कि झारखंड राज्य की पहचान यहां की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, परंपरा, प्रकृति आधारित जीवनशैली एवं विशिष्ट धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई रही है। राज्य के आदिवासी समाज की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराएं सदियों से प्रकृति पूजा, जल-जंगल जमीन तथा सामुदायिक जीवन मूल्यों पर आधारित रही है, जिसे व्यापक रूप से सरना धर्म के रूप में माना जाता है।
उन्होंने आगे लिखा कि झारखंड राज्य के गठन के मूल आधारों में यहां कि आदिवासी पहचान, संस्कृति अस्मिता एवं स्थानीय जनभावनाओं का विशेष महत्व रहा है। राज्य के विभिन्न आदिवासी समुदाय आज भी अपने पारंपरिक रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार एवं प्राकृतिक आधारित आस्था को संरक्षित रखते हुए सामाजिक जीवन का संचालन कर रहे है।
महोदय, यह सर्वविदित है कि विगत कई वर्षो से झारखंड सहित देश के विभिन्न आदिवासी बहुल क्षेत्रों में जनगणना के दौरान सरना धर्म कोड की पृथक मान्यता की मांग लगातार उठती रही है। झारखंड विधानसभा द्वारा भी इस संबंध में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जा चुका है। राज्य के विभिन्न संगठनों, बुद्धिजीवियों एवं आदिवासी समुदायों द्वारा भी यह भावना निरंतर व्यक्त की जाती रही है कि जनगणना में उनकी विशिष्ट धार्मिक पहचान को पृथक रूप से दर्ज किया जाना चाहिए।
देश की माननीय राष्ट्रपति आदरणीय श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी को पत्र लिखकर आदिवासी समाज की भावना और झारखंड राज्य की आकांक्षा को ध्यान में रखते हुए जनगणना के द्वितीय चरण में आदिवासी/सरना धर्म (साथ ही अन्य सदृश्य धार्मिक व्यवस्था) के लिए अलग कोड निर्धारित करने का अनुरोध किया है, ताकि… pic.twitter.com/zjzyr6XWVf
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मुख्यमंत्री ने आगे राज्यपाल को कहा है कि आपके द्वारा की गयी स्व-गणना की प्रक्रिया के दौरान यह देखा गया होगा कि विहित प्रपत्र में अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति के संबंधित कॉलम का उल्लेख तो किया गया है, किन्तु आदिवासी समाज की विशिष्ट धार्मिक पहचान सरना धर्म के पृथक उल्लेख का स्पष्ट प्रावधान नहीं दिखता। इससे यह भावना स्वभावित रूप से उत्पन्न होती है कि सामाजिक एवं प्रशासनिक वर्गीकरण के साथ-साथ धार्मिक एवं सांस्कृति पहचान का भी समुचित अभिलेखीकरण आवश्ययक है। यह किसी समुदाय की विशिष्ट पहचान का पृथक रूप से अभिलेखीकरण नहीं किया गया है, तो उससे भविष्य की नीतियों एवं योजनाओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

महोदय, संविधान की धारा-244 एवं पांचवीं अनुसूची में राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्र और जनजातियों के अधिकार की सुरक्षा के कुछ विशेष उत्तदायित्व दिये गये है, जो झारखंड जैसे राज्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आप झारखंड की सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि तथा यहां की जनभावनाओं से भली-भांति परिचित है। राज्य के आदिवासी समाज की यह अपेक्षा रही है कि उनकी पारंपरिक आस्था एवं धार्मिक पहचान को संवैधानिक एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उचित सम्मान एवं स्थान प्राप्त हो।
अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि आगामी जनगणना में सरना धर्म को अलग कोड देते हुए उनको पृथक पहचान प्रदान किए जाने के संबंध में राज्य की जनभावनाओं , झारखंड विधानसभा के संकल्प तथा आदिवासी समाज की सांस्कृतिक अस्मिता को ध्यान में रखते हुए माननीय राष्ट्रपति एवं माननीय प्रधानमंत्री जी के समक्ष इस विषय पर सकारात्मक पहल एवं आवश्यक अनुशंसा करने की कृपा करें।

यह पहल झारखंड की आदिवासी संस्कृति, सामाजिक समरसता एवं लोकतांत्रिक सहभागिता को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी। मुख्यमंत्री ने इस तरह से एक बार फिर से सरना धर्म कोड का मामले को और तेज कर दिया है। वर्तमान में चल रहे स्व-गणना और 2027 में होने वाले जनगणना से पहले सरना धर्म कोड के मामले को उठाकर झारखंड की राजनीति को एक बार फिर से गर्म कर दिया है।



