रांची: PESA यानि Panchayat (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 । एक ऐसा कानून जिसे लागू होने का इंतजार झारखंड की जनता को दशकों से थी। जब संयुक्त बिहार था तब ही ये कानून बन चुका था लेकिन अलग राज्य बनने के 25 वर्षों बाद भी PESA को इंतजार करना पड़ा । पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने इस कानून के बारे में कहा था कि “आदिवासियों को आधुनिक आर्थिक प्रक्रियाओं में हिस्सा देने में एक संगठित विफलता रही है, जो लगातार उनके जीवन क्षेत्रों में हस्तक्षेप करती रही हैं… हमारे आदिवासी समुदायों का सुनियोजित शोषण और सामाजिक-आर्थिक दुरुपयोग अब और सहन नहीं किया जा सकता।”
भारत में आदिवासी विकास की विफलता
पिछले छह दशकों में भारत ने आर्थिक विकास, सांस्कृतिक एकीकरण और वैश्विक राजनीतिक हितों के क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं।
परंतु इस विकास यात्रा के बीच आदिवासी मामलों को अक्सर हाशिए पर रख दिया गया है। विकास की आड़ में आदिवासियों को उनकी ही भूमि में पराएपन का अनुभव कराया गया है। समय के साथ विकास की प्रक्रिया ने उनके परंपरागत भूमि अधिकारों और वन संसाधनों पर पकड़ को कमजोर कर दिया। यह स्थिति कानूनों की खामियों, उनके गलत कार्यान्वयन और लालची व्यापारियों व साहूकारों द्वारा शोषण के कारण उत्पन्न हुई।
इतिहास में आदिवासी और वन अधिकार (Tribal Forest Rights in History)
आदिवासी और वन — दोनों एक-दूसरे के पर्याय हैं। आदिवासी सदियों से वनों में रहते आए हैं और उनका इनसे भावनात्मक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध रहा है। ब्रिटिश काल से पहले, स्थानीय राजाओं के पास वनों पर अधिकार था और आदिवासी इन वनों के उत्पादों से अपनी जीविका चलाते थे। अंग्रेजों के आगमन के बाद, 1927 में भारतीय वन अधिनियम (Indian Forest Act) लाया गया। इस अधिनियम ने आदिवासियों के मौलिक वन अधिकारों को छीन लिया। एक ही कानून के माध्यम से आदिवासियों को अपनी ही भूमि पर अवैध घुसपैठिया बना दिया गया। विदेशी न्यायिक प्रणाली और ‘कानून-व्यवस्था’ के औपनिवेशिक ढाँचे ने उन्हें और अधिक कमजोर व निर्भर बना दिया।
आजादी के बाद कैसे बना कानून
स्वतंत्रता के बाद, ये अधिकार राज्यों को सौंप दिए गए। इससे आदिवासियों के अधिकार केवल निस्तारी अधिकारों (ईंधन, चारा आदि) तक सीमित रह गए।
वनों से मिलने वाले लकड़ी और अन्य गैर-लकड़ी उत्पादों पर राज्य सरकार का ही अधिकार बना रहा। धीरे-धीरे वन ठेकेदारों और सरकारी प्रतिनिधियों के गठजोड़ ने राजनीतिक लाभ के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई को बढ़ावा दिया। इस पर अंकुश लगाने के लिए 1980 में वन (संरक्षण) अधिनियम लागू किया गया, जिसने राज्यों को बिना केंद्र सरकार की अनुमति के वन भूमि को अन्य कार्यों में उपयोग करने से रोका। 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने “वन” की परिभाषा का विस्तार किया और राजस्व भूमि पर घोषित ग्राम वनों को भी इसके दायरे में शामिल कर दिया।
वन संरक्षण और आदिवासी सहभागिता
वनों का संरक्षण केवल वन विभाग के कर्मचारियों से नहीं हो सकता। इसके वास्तविक हितधारक — यानी वनवासी और आदिवासी — ही इसके संरक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वनों को राज्य के राजस्व स्रोत के बजाय वनवासियों की आजीविका के स्रोत के रूप में देखा जाना चाहिए। वन कानूनों का उद्देश्य वनवासियों को सशक्त बनाना होना चाहिए, ताकि वे स्वयं वनों के संरक्षक और रक्षक बन सकें — न कि नौकरशाही के अधीन। यह भी ध्यान देने योग्य है कि आदिवासी क्षेत्र पृथ्वी के अंतिम प्राकृतिक संसाधन भंडार हैं, क्योंकि आदिवासी ज्ञान प्रणाली सतत जीवन शैली सुनिश्चित करती है और उनका धर्म व दृष्टिकोण सभी जीवों के संरक्षण पर आधारित है।
संविधान और आदिवासी (Constitution and the Tribals)
भारत के संविधान में अधिकांश जनजातियों को अनुच्छेद 342 (1) और (2) के तहत अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
आदिवासियों के स्वशासन के अधिकार की गारंटी संविधान के भाग X में दी गई है, जो अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों से संबंधित है।
अनुच्छेद 244: अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन
- पाँचवी अनुसूची (Fifth Schedule) —
यह अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम को छोड़कर अन्य सभी राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों के प्रशासन व नियंत्रण से संबंधित है। - छठी अनुसूची (Sixth Schedule) —
यह अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है।




