सरदार पटेल की 150वीं जयंती: जब पत्नी के निधन का तार पढ़ कर भी बहस करते रहे थे वल्लभभाई…पहले गांधीजी का उड़ाया मजाक फिर बन गए भक्त

sardar patel

भारत के वर्तमान इतिहास में किसी एक व्यक्ति के लिए इतने नाम या विशेषण प्रयोग में नहीं आए होंगे जितने वल्लंभभाई पटेल के लिए। आजादी की लड़ाई में त्रिमृर्ति के नाम से प्रसिद्ध गाँधीजी, जवाहरलाल जी और वल्लभभाई पटेल की जोड़ी दो की बजाए तीन से बनती थी। उसमें गाँधीजी के लिए महात्मा” तथा जवाहरलाल जी के लिए पंडितजी’ शब्द प्रचलित था। वैसे ही उस समय के कतिपय अन्य नेताओं, जैसे श्री सुभाष चन्द्र बोस के लिए नेताजी , राजगोपालाचारी के लिए ‘राजाजी’ , डा० राजेन्द्र प्रसाद के लिए देशरत्न’ , चितर॑जनदास के लिए ‘देशबंधु’ का प्रयोग भी काफी प्रचलित था। लेकिन वलल्‍लभभाई पटेल के लिए चार विशेषण प्रयोग में आते थे-लौहपुरुष, सरदार, विस्मार्क और चाणक्य।

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फांसी तय थी लेकिन करा दिया रिहा

कहा जाता है कि वललभभाई जटिल से जटिल मुकदमा अपने हाथ में लेते थे। यह भी कहा जाता है कि जो मुकदमा वे हार जाते थे तो उस म॒वक्किल से फीस भी नहीं लेते थे। इन्हीं दिनों उनके पास एक कठिन मामला आया। इलाके के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति पर हत्या का जुर्म था। कई चश्मदीद गवाह भी इसमें थे। जो भी तथ्य सामने थे उसमें उस आदमी को फाँसी अथवा उम्र कैद की सजा निश्चित थी।  मुकमदे में यह कहा गया था कि मुजरिम ताँगे पर तेजी से चला जा रहा था और घर के बरामदे में बैठे एक आदमी की उसने हत्या कर दी। वललभभाई ने एक ही बात पर बहस की कि किसी ने यह नहीं कहा कि ताँगा रुका और उस पर से मुजरिम उतरा, तब उसने हत्या की और रुके हुए तौंगे पर चढ़कर चला गया। अँग्रेज जज को यह दलील पंसद आई और उसने मजरिम को साफ रिहा कर दिया। ऐसी थी बलल्‍लभभाई की तर्कशक्ति की विशेषता।

पत्नी के निधन के खबर के बाद भी करते रहे जिरह

इसके साथ ही घिर्य, एकाग्रता तथा जबावदेही का विचित्र संगम वल्लभभाई के जीवन में था। ।909 की बात है, जब वे नडियाद कोर्ट में एक गंभीर मुकदमे में बहस कर रहे थे। उसी समय किसी ने उनके हाथ में एक तार लाकर दिया। वल्लभभाी ने उसे पढ़ा और जेब में रखकर जिरह करते रहे। मुकदमा जब समाप्त हुआ, जिसमें उनकी जीत हुई तब लोगों को यह जानक्रारी मिली’ कि तार में उनकी पत्नी झबेर बा के निधन का दुखद समाचार था। लोग अवाक रह गए। झबेर बा अपने पीछे 5 साल की पत्री मणित्रेन और 4 साल के पत्र डाहयाभाई को छोड़कर गईं। वल्लभभाई पर इन दोनों बच्चों के लालन पालन का भार भी पड़ा, लेकिन वे कभी भी विचलित नहीं हुए । 

sardar patel and nehru

गांधी का उड़ाया था मजाक

गाँधीजी ने 95 में दक्षिण अफ्रीका को सदा के लिए छोड़ दिया और भारत आकर कछ दिन शांति निंकेतन में रहने के बाद अहमदाबाद को अपना स्थायी केन्द्र बनाया। यहाँ उन्होंने एक किराए का मकान लेकर ‘कोचरब आश्रम’ की स्थापना की। आश्रम में वे शिक्षा से लेकर सत्याग्रह और शारीरिक श्रम संबंधी अनेक प्रयोग करना चाहते थे। अपनी योजना को लोगों तक पहुँचाने की दृष्टि से वे एक दो बार गुजरात क्लब में आए। यहाँ उन दिनों पढ़े लिखों और वकीलों का जमघट रहता था। ऐसी ही एक बैठक में जब गाँधीजी बोलने आए, तो कई लोग उन्हें सुनने के लिए इकट्ठे हुए, परन्तु वललभभाई जो अपने मित्रों के साथ उसी क्लब के एक हिस्से में ताश खेल रहे थे, उठे भी नहीं। अन्य मित्रों ने जब जाने की उत्सुकता दिखलाई तो वललभभाई ने उन्हें भी फटकारा-, इसमें क्या सुनना है। वे तो गेहूँ से कंकड़ बीनने की बात ही कहेंगे। ऐसा करने से क्या देश स्वतंत्र होने वाला है?’ इसी बीच 1917 में गोधरा में गुजरात-सभा का अधिवेशन हुआ, जिसमें वल्‍लभभाई भी शामिल हुए और वहाँ उन्होंने गाँधीजी का अंग्रेजों के विरुद्ध प्रभावशाली भाषण तथा बहिष्कार का नारा सना तो दंग रह गए। उनके मन में यह भाव आने लगा कि यह कोई मामली स्वयंसेवक या आश्रमवासी नहीं है, वरन यह व्यक्ति कोई बड़ा काम क्रना चाहता है। यहीं से वललभभाई गाँधीजी की ओर आकर्षित होने लगे और आगे आने वाले दो-तीन वर्षों के अंदर ही उन्होंने अपने आपको गाँधीजी के हवाले कर दिया

शंकर दयाल सिंह द्वारा लिखित ‘लौहपुरुष सदरदार वल्लभभाई पटेल’ पुस्तक से साभार 

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