रांची: की मेयर आशा लकड़ा को बधाइयां मिल रही है । उन्हें राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का सदस्य बनाया गया है । राष्ट्रपति कार्यालय द्वारा अधिसूचना जारी हो चुकी है । मगर आशा लकड़ा को शायद ही इस कामयाबी का खुशी हो रही होगी । इस पद से जो दर्द मिला है उसे आशा लकड़ा ना तो दिखा सकती है और ना ही किसी से साझा । असल में आशा लकड़ा को अनुसूचित जनजाति आयोग का सदस्य बना झारखंड बीजेपी के गैर आदिवासी नेताओं ने वो पॉलिटिक्स खेली है जिसके लिए झारखंड के गैर आदिवासी नेता बदनाम हैं । पहली सूची में संजय सेठ का नाम ऐलान होने के साथ ही बीजेपी ने आशा लकड़ा के संसद के सारे रास्ते फिलहाल बंद कर उन्हें रांची से दूर कर दिया ।
अब आशा लकड़ा के साथ ये खेल किसने किया इसकी पड़ताल जरुरी है क्योंकि माना जा रहा था कि इस बार आशा लकड़ा को पार्टी के लिए सेवा का फल मिलेगा । मगर संजय सेठ भारी पड़ गए । हांलाकि संजय सेठ का बतौर सांसद प्रदर्शन औसत ही रहा, ठीक वैसा ही जैसा की चतरा के सांसद सुनील सिंह का है । सुनील सिंह का टिकट अभी लटका है । कहा जा रहा है कि झारखंड बीजेपी के दूसरे आदिवासी नेता नहीं चाहते हैं कि कोई महिला आदिवासी नेता राज्य से राष्ट्रीय स्तर पर उभरे इसलिए आशा लकड़ा को दिल्ली में बहुत ज्यादा समर्थन नहीं मिल सका । राष्ट्रीय जनजाति आयोग का सदस्य बन जाने से अब वो सीधे तौर से बीजेपी का झंडा नहीं उठा सकती है और ना ही चुनावी सभाओं, रैलियों और प्रचार में नजर आने का हक मिलेगा । यानि की झारखंड बीजेपी के नेताओं ने आशा लकड़ा के साथ ‘आउट ऑफ साइट आउट ऑफ माइंड’ की पॉलिटिक्स कर दी। उभरते हुए नेता को जनता से दूर करने की साजिश की शिकार हुई आशा लकड़ा को उम्मीद थी कि बीजेपी रांची से लोकसभा चुनाव लड़ने का मौका देगी मगर दिल्ली और झारखंड बीजेपी नेताओं ने गैर आरक्षित सीट को एक आदिवासी के हवाले करने में फायदा समझा और संजय सेठ को टिकट दे दिया । हालांकि माना जा रहा है कि आशा लकड़ा रघुवर दास गुट की रही हैं इसलिए बाबूलाल मरांडी ने भी तरजीह नहीं दी । अब आशा लकड़ा के पास सरकारी गाड़ी-पदवी और तमग़ा तो होगा मगर पॉलिटिक्स नहीं होगी जिसके लिए उन्होंने इतनी मेहनत की ।



