अतीत की घटनाओं से अवगत होकर स्वतंत्रता सेनानियों से प्रेरणा लेनी चाहिए- राज्यपाल

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May 4, 2022

इतिहास में वास्तविकता आनी चाहिए, शोधकर्ता अपने शोध में इस दिशा में ध्यान दें
रांची। झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस ने कहा कि अतीत की घटनाओं से अवगत होकर स्वतंत्रता सेनानियों से प्रेरणा लेनी चाहिए। राज्यपाल आज डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, रांची एवं इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, क्षेत्रीय कार्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी एवं प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
राज्यपाल ने कहा कि देशभर में एक अभियान चलाकर देश की आजादी के लिए स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों द्वारा दिये गये बलिदान एवं उनके योगदान से सबको अवगत कराने और देशभक्ति की भावना जागृत करने के साथ-साथ गुमनाम शहीदों की गाथाएं जन-जन तक पहुँचाना है। जब हम देशवासी पूरी तरह जान जायेंगे कि हमें स्वाधीनता कितनी कठिनाई से मिली, इसके लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों को कितना संघर्ष करना पड़ा, कितनी यातनाएं झेलनी पड़ी तो हर देशवासी में राष्ट्रभक्ति की भावना स्वतः ही जागृत हो जायेगी। वे मातृभूमि से प्रेम की अहमियत को समझ पायेंगे।
उन्होंने कहा कि आजादी का अमृत महोत्सव हमें यह भी अवसर देता है कि हम अपने भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने इतिहास को और भी गहराई से जाने, क्योंकि जब आप आजादी के संघर्ष के बारे में पढ़ेंगे और उसको गहराई से जानने का प्रयास करेंगे तो आपको पता लगेगा कि भारत माता ने कैसे-कैसे वीरों को जन्म दिया है।
राज्यपाल ने कहा कि स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए बहुत सारे देशवासी शहीद भी हुए जिनमें कुछ लोग ऐसे थे जिनकी उम्र बहुत कम थी, लेकिन अपने वतन को लेकर इतना प्रेम था और देश प्रेम की भावना इतनी प्रबल थी कि बिना किसी भय के ब्रिटिश हुकूमत को कड़ी चुनौती दी और उनका डटकर सामना अपनी आखिरी सांस तक किया। 1770 आते-आते तिलका मांझी ने अंग्रेज़ों से लोहा लेने की पूरी तैयारी कर ली थी। उन्होंने लोगों को अंग्रेज़ों के आगे न झुकने के लिये कहा। उनके नेतृत्व में जनजातियों ने 1778 में रामगढ़ छावनी, जो अभी झारखंड में ही है, में तैनात पंजाब रेजिमेंट पर हमला कर दिया। उनकी सेना के जोश के सामने अंग्रेज़ों को छावनी छोड़ कर भागना पड़ा। 1831 में कोल विद्रोह अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ किया गया एक महत्वपूर्ण विद्रोह था। कोल विद्रोह के पहले ही 1795-1800 तक तमाड़ विद्रोह, 1797 में विष्णु मानकी के नेतृत्व में बुंडू में मुंडा विद्रोह, 1798 में चुआड़ विद्रोह, 1798-99 में मानभूम में भूमिज विद्रोह और 1800 में पलामू में चेरो विद्रोह ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की अटूट शृंखला कायम कर दी थी। 1832 में वीर बुधु भगत ने ष्लरका विद्रोहष् नामक ऐतिहासिक आन्दोलन का सूत्रपात्र किया। 1831-32 में तेलंगा खड़िया, वर्ष 1855 में सिद्धो-कान्हू, चांद-भैरव और दो बहनें फूलो-झानो ने संघर्ष की एक ऐसी कहानी लिखी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर हो गई। सर्वविदित है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इस क्षेत्र के महान विभूतियों ने भी ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया। इस क्षेत्र में 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से पूर्व ही अंग्रेजों के विरुद्ध कई आंदोलन हुए। 1910-16 के मध्य में जतरा टाना भगत तथा 1857 के महासंग्राम में ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, टिकैत उमराव सिंह, शेख भिखारी, ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, नीलाम्बर-पीतांबर आदि ने अग्रणी भूमिका निभाई। 1895-1900 के मध्य धरती आबा बिरसा मुंडा आदि ने अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन किया।

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