डॉ मनमोहन सिंह के प्रति इतिहास को दयालु होना ही पड़ा ! भारत को बदल देने वाले के जाने पर शोक में डूबा देश

Dr Manmohan Singh

“माना की तेरे दीद के क़ाबिल नहीं हूं मैं…” (2011 -24 मार्च को संसद में दिए गए भाषण का अंश)
पूरे सदन को हंसा देने वाला यह शख्स, एक दिन सभी को रुला गया। डॉ. मनमोहन सिंह, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, अब इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं। और जैसे उन्होंने खुद कहा था, “हिस्ट्री विल बी काइंडर टू मी”(history will be kinder to me)—इतिहास ने उनके कहे को सच साबित कर दिया।

सोशल मीडिया पर नज़र डालें तो यह साफ दिखता है कि हर पक्ष और विपक्ष ने इस महान अर्थशास्त्री को सम्मान और श्रद्धा के साथ याद किया। बतौर प्रधानमंत्री, जिन्होंने अपने कार्यकाल में तमाम आलोचनाओं और प्रहारों को मुस्कुराते हुए सहा, उन्हें पूरा यकीन था कि एक दिन इतिहास उनके काम की अहमियत को समझेगा।

92 वर्ष की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली, और जैसे पूरे देश की सांसें थम-सी गईं। पुरानी पीढ़ी उनकी यादों में डूब गई। वह पहला बजट भाषण याद किया गया, जिसने करोड़ों भारतीयों के चेहरे पर मुस्कान लाई और भारत को आर्थिक प्रगति के रास्ते पर अग्रसर किया। 1992 का वह ऐतिहासिक बजट भाषण, जिसने भारत की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी और एक विशाल मध्य वर्ग को जन्म दिया, आज भी लोग याद करते हैं।

डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने पीछे एक ऐसा भारत छोड़ा है, जिसकी आर्थिक ताकत का लोहा पूरी दुनिया मानती है। गरीबी, आर्थिक बदहाली और कर्ज़ के दलदल से उन्होंने देश को निकालकर वैश्विक स्तर पर सम्मान दिलाया। पीवी नरसिंह राव की सरकार में वित्त मंत्री के तौर पर उन्होंने जो आर्थिक सुधार शुरू किए, उन्होंने भारत को उस मुकाम तक पहुंचाया कि बड़ी-बड़ी वैश्विक शक्तियां भी आज भारत को नज़रअंदाज करने की हिम्मत नहीं कर पातीं।

प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने विपक्ष के तमाम हमलों को चुपचाप सहा। संसद में उनके सामने अटल बिहारी वाजपेयी, सुषमा स्वराज, और एलके आडवाणी जैसे दिग्गज विपक्षी नेता थे। बावजूद इसके, उन्होंने हर आलोचना का जवाब अपने शांत स्वभाव और दूरदर्शिता से दिया।

डॉ. सिंह के कार्यकाल को उनके विरोधियों ने कई बार ‘मौनमोहन सिंह’ कहकर तंज कसा, लेकिन इतिहास गवाह है कि यही ‘मौनमोहन’ सवा घंटे तक 43 पत्रकारों के सवालों का बेबाकी से जवाब देने वाले पहले प्रधानमंत्री थे। चाहे असम के दंगे हों या मुंबई पर आतंकी हमला, उन्होंने हर मुद्दे पर संसद में विस्तार से अपनी बात रखी।

उनकी शख्सियत सत्ता की लालसा से परे थी। वह सत्ता में रहकर भी सत्ता के मोह से बचे रहे और देश को एक मजबूत नींव प्रदान की। एक ऐसा प्रधानमंत्री, जो आलोचनाओं को सहता रहा, मगर देश के लिए काम करता रहा।

आज जब डॉ. मनमोहन सिंह हमारे बीच नहीं हैं, तो उनकी कमी हर भारतीय को महसूस हो रही है। लेकिन जैसा उन्होंने कहा था, “हिस्ट्री विल बी काइंडर टू मी,”—इतिहास ने उन्हें अमर बना दिया। उनके योगदान और व्यक्तित्व को आने वाली पीढ़ियां भी याद करेंगी

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