शिबू सोरेन के पैतृक गांव नेमरा में सन्नाट, किसी घर में नहीं जला चूल्हा

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August 4, 2025

शिबू सोरेन का परिवार

रामगढ़, नेमराः शिबू सोरेन के निधन की खबर के बाद उनके पैतृक आवास नेमरा में सन्नाटा पसरा है । जैसे ही खबर मिली की दिशोम गुरु नहीं रहे तो उनके गांव नेमरा में लोग फूट-फूट कर रोने लगे । पूरे गांव में आज चूल्हा नहीं जलाया गया है । शिबू सोरेन अक्सर अपने गांव नेमरा आते रहते थे । हेमंत सोरेन भी अक्सर आते हैं ।  

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आदिवासी दुनिया की शेरदिल आवाज़ हमेशा के लिए शांत हो गई  । अब हमारे बीच जल-जंगल-जमीन का सबसे बड़ा लड़ाका नहीं रहा । सारंडा के साल जैसे मज़बूत और विशाल वृक्ष जैसे  दिशोम गुरु 2025 के मानसून की बारिश में ऐसे बीमार पड़े की डॉक्टर्स उन्हें नहीं बचा पाए  ।  दिल्ली के सर  गंगाराम अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली । उनके आखिरी क्षणों में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन , बहू कल्पना सोरेन मौजूद रहे । जिस झारखंड के लिए उन्होंने अपना जीवन न्योझावर कर दिया उसकी कमान उनके जाने के वक्त उनके बेटे के हाथ में है ।   जैसे ही कल्पना सोरेन को खबर मिली कि दिशोम गुरु नहीं रहे.. फूट-फूट कर रोने लगीं … हेमंत सोरेन की आंखें भी नम थीं ।  दिल्ली में मौजूद झारखंड के नेता…और कई सांसद नेता श्रद्धांजलि देने सर गंगाराम अस्पताल पहुंचे..

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दिशोम गुरु की तबीयत कई वर्षों से ख़राब चल रही थी । सक्रिय राजनीति से अलग होते ही गए थे हाल के दशक में । सेहत की वजह से ना तो चुनाव प्रचार में हिस्सा लेते थे और ना ही कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात हो पाती थी । तीन दिनों तक दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में उनका इलाज चलता रहा लेकिन कई तरह की गंभीर बीमारियों की वजह से उन्हें डॉक्टर्स बचा नहीं पाए । 

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शिबू सोरेन के निधन से पहले राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ख़ुद सर गंगाराम अस्पताल पहुंची थी और गुरुजी का हाल चाल जाना था । हेमंत और कल्पना सोरेन से मुलाक़ात कर जल्द से जल्द सेहतमंद होने की दुआ की थी, मगर होनी को कुछ और ही मंजूर था । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू काफी देर तलक अस्पताल में रहीं । राष्ट्रपति के आगमन से एक दिन पहले झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार  भी दिशोम गुरु की सेहत की जानकारी लेने सर गंगाराम अस्पताल पहुंचे थे । 

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झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके शिबू सोरेन का जीवन संघर्ष, आंदोलन और समाज के वंचित तबके को अधिकार दिलाने की कहानी है।

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को तत्कालीन बिहार के हजारीबाग (अब रामगढ़) जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरा सोरेन की जमींदारी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाने पर हत्या कर दी गई थी। तभी से शिबू सोरेन ने ठान लिया था कि वे आदिवासियों को उनका जल-जंगल-जमीन का हक दिलाकर रहेंगे।

झारखंड आंदोलन के अगुआ

1972 में शिबू सोरेन ने ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ की स्थापना की। यह संगठन बिहार से अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर बना और बाद में पूरे आदिवासी समाज के अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बन गया। शिबू सोरेन ने जल-जंगल-जमीन और आदिवासी अस्मिता के मुद्दे पर दशकों लंबा संघर्ष किया। उनका यह संघर्ष आखिरकार 15 नवंबर 2000 को रंग लाया जब झारखंड को बिहार से अलग कर एक नया राज्य बनाया गया।

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तीन बार के मुख्यमंत्री

शिबू सोरेन ने झारखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ तीन बार ली:

पहली बार: मार्च 2005 में, पर बहुमत साबित नहीं कर पाए।

दूसरी बार: अगस्त 2008 से जनवरी 2009 तक।

तीसरी बार: दिसंबर 2009 से मई 2010 तक।

इसके अलावा वे केंद्र सरकार में कोयला मंत्री भी रहे।

आदिवासी समाज के “दिशोम गुरु”

शिबू सोरेन को झारखंड के आदिवासी समाज में “दिशोम गुरु” कहा जाता है, यानी जनजातीय समुदाय का मार्गदर्शक। वे न केवल राजनीतिक नेता हैं, बल्कि एक विचारधारा और संघर्ष का प्रतीक भी हैं।

वर्तमान स्थिति

इन दिनों शिबू सोरेन उम्रजनित स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। हाल ही में उन्हें इलाज के लिए दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी स्थिति स्थिर बनी हुई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और परिवार के सदस्य लगातार उनके स्वास्थ्य की निगरानी कर रहे हैं।

निष्कर्ष

झारखंड के इतिहास में दिशोम गुरु शिबू सोरेन का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने न केवल एक राज्य का निर्माण कराया, बल्कि आदिवासी समाज को आत्मसम्मान और राजनीतिक चेतना दी। झारखंड की राजनीति में उनका नाम हमेशा एक आदर्श और प्रेरणा के रूप में याद किया जाएगा।

 

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