‘शंभू महतो’ वाली ‘दो बीघा जमीन’ 4K में हुई रिस्टोर, वेनिस फिल्म फेस्टिवल में विमल रॉय की फिल्म बताएगी विस्थापन की कहानी

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Live Dainik

August 30, 2025

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डेस्कः “मां वहां देखो जहां से धुआं उठ रहा है ना ठीक वहीं पर अपना मकान था” मां कहती है… “और वहां मेरी रसोई थी”। विमल राय की कालजयी फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ का ये आखिरी डॉयलॉग्स झारखंड के हर विस्थापित की कहानी है । आजादी के छह वर्ष बाद बनी विमल राय की ‘दो बीघा जमीन’ को रिस्टोर कर 4K में  वेनिस फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जाएगी । नेहरु के भारत के जमाने में जब शुरुआती दौर में कृषि को छोड़ उद्योगों को तरजीह दी गई थी तब विमल राय ने साहस दिखाते हुए किसानों की दुर्दशा दिखाने वाली  फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ बनाई । 

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विमल रॉय द्वारा निर्देशित क्लासिक फिल्म दो बीघा ज़मीन का नया 4K संस्करण अब विश्व स्तर पर प्रदर्शित होने जा रहा है। 1954 में इस फिल्म ने कान्स फिल्म फेस्टिवल में Prix International पुरस्कार जीता था और अब इसका वर्ल्ड प्रीमियर 4 सितंबर को वेनिस फिल्म फेस्टिवल में होगा।  इसका प्रीमियर साला कोरिंतो में होगा, जिसे अस्थायी सिनेमाघर में बदला गया है।

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महान निर्देशक विमल राय की फिल्म

विमल रॉय भारतीय सिनेमा के उस दौर के अग्रणी फिल्मकार थे जिन्हें हिंदी फिल्मों का “गोल्डन एरा” कहा जाता है। 1950 और 60 के दशक में उन्होंने एक से बढ़कर एक यादगार फिल्में दीं। बिराज बहू (1954), देवदास (1955), मधुमती (1958), सुजाता (1959) और बंदिनी (1963) उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं।

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 इस तरह ‘दो बीघा जमीन’ हुई रिस्टोर

दो बीघा ज़मीन को क्राइटेरियन कलेक्शन और जेनस फिल्म्स ने फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन के सहयोग से पुनर्स्थापित किया है। इसमें लइमाजिने रित्रोवाटा और रेसिलियन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का भी सहयोग रहा। वेनिस फिल्म फेस्टिवल को इस फिल्म की स्क्रीनिंग के लिए चुना गया क्योंकि इसका इटली से गहरा नाता है। विमल रॉय, इतालवी फिल्मकार विटोरियो डी सीका की मशहूर फिल्म बाइसिकल थीव्स से गहराई से प्रभावित थे और उसी से प्रेरणा लेकर उन्होंने दो बीघा ज़मीन बनाई।

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बलराज साहनी बने थे शंभू महतो

यह फिल्म एक गरीब किसान शंभू महतो (बजराय साहनी) की कहानी कहती है, जो अपनी जमीन छिन जाने के बाद शहर जाकर रिक्शा खींचकर रोज़ी-रोटी कमाता है। उसका बेटा जूते पॉलिश करता है। गरीबी और संघर्ष के बावजूद अंततः वह अपनी जमीन नहीं बचा पाता और औद्योगिकीकरण की मार झेलता है। यह फिल्म ग्रामीण और शहरी जीवन के विरोधाभास और मजदूर वर्ग की करुण वास्तविकता को दर्शाती है।

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विमल रॉय की विरासत

विमल रॉय ने कोलकाता से फिल्म निर्माण की शुरुआत की और आगे चलकर विमल रॉय प्रोडक्शन की स्थापना की। इसी बैनर के तहत उन्होंने दो बीघा ज़मीन बनाई, जो भारतीय सिनेमा की सबसे प्रभावशाली फिल्मों में गिनी जाती है।

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गुलजार ने बताया भारतीय सिनेमा की आत्मा

लेखक और गीतकार गुलज़ार ने कहा— “यह गर्व की बात है कि दो बीघा ज़मीन का पुनर्निर्मित संस्करण वेनिस फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित होने जा रहा है। यह फिल्म भारतीय सिनेमा की असली आत्मा को पूरी दुनिया के सामने पेश करेगी।” यह फिल्म रवींद्रनाथ टैगोर की कविता दुइ बीघा ज़मीन पर आधारित है और इसका पटकथा लेखन सलील चौधरी ने किया था

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