सरहुल की झारखंड में धूम, पाहन ने की झमाझम बारिश की भविष्यवाणी, अन्न से भरे रहेंगे भंडार

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March 21, 2026

सरहुल की झारखंड में धूम, पाहन ने की झमाझम बारिश की भविष्यवाणी, अन्न से भरे रहेंगे भंडार

रांचीः राजधानी रांची समेत पूरे झारखंड में सरहुल धुमधाम से मनाया जा रहा है। सभी जगहों पर पारंपरिक तरीके से पूजा अर्चना की गई। राजधानी प्राकृतिक रंगों और आस्था के सैलाब में डूबी नजर आई। प्रकृति और पुरुष के अटूट बंधन के इस पर्व पर पाहन (पुजारी) ने भविष्य की सुखद तस्वीर पेश की है।

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सरहुल शोभा यात्रा के उद्गम स्थल हातमा (सरना टोली) स्थित सरना स्थल पर पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ पूजा-अर्चना की गई।मुख्य पाहन जगलाल पाहन ने सरई (सखुआ) के पेड़ों की छांव में प्रकृति और देवी-देवताओं का आह्वान किया। इस दौरान उन्होंने निम्न बलि और अर्पण के माध्यम से लोक कल्याण की कामना की।
इष्ट देवता: सफेद मुर्गा अर्पित किया गया।
ग्राम देवता: रंगवा मुर्गा की बलि दी गई।
जल देवता: लाल मुर्गा अर्पित किया गया।
पुरखों (पूर्वजों) की स्मृति: रंगीली मुर्गा चढ़ााया गया।
बुरी आत्माओं से रक्षा: काली मुर्गी अर्पित की गई।
इसके साथ ही पारंपरिक चावल की हड़िया (तपान) का अर्पण कर यह प्रार्थना की गई कि प्रकृति मनुष्य के रहने के अनुकूल और सौंदर्यपूर्ण बनी रहे।

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प्रकृति पर्व सरहुल के पहले दिन शुक्रवार को पूजा में बैठनेवालों ने उपवास रखा। सुबह में पाहन ग्रामीणों के साथ जाकर नदी, तालाबों व पानी वाले खेतों के आसपास केकड़ा और मछली पकड़ने निकले। पकड़े गये केकड़ा को बांधकर चूल्हे के उपर टांग दिया जाता है। बाद में बारिश के मौसम में खेतों में इनके चूर्ण को डाला जाता है। यह विधि इन मान्यता के साथ की जाती है कि फसल अच्छी हो। नदी, तालाबों व अन्य जलस्त्रों के पास जाकर दो नये घड़ों में पानी भरकर लाया गया। इसके बाद सरना स्थल में पांच मुर्गे- मुर्गियों की बलि दी गयी। इनमें सफेद मुर्गा सृष्टिकर्ता के लिए, रंगुआ मुर्गा ग्राम देवता के लिए, माला मुर्गा इकिरबोंगा के लिए, रंगली मुर्गी पूर्वजों के लिए और काली मुर्गी की बलि बुरी आत्माओं को संतुष्ट करने के लिए दिया गया।

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घड़े की पानी से मानसून का लगाया जाता है पता

सरहुल को झारखंड के जनजाति प्रकृति का महापर्व के रूप में मना रहे हैं. पूरी आस्था और उमंग के साथ मनाया जा रहा यह पर्व जनजातियों के लिए खास है। इस मौके पर सखुआ (साल) के फूलों को खास तौर पर लोग सिर पर लगाते हैं। इस दौरान सरना स्थल (जनजातियों का पूजा स्थल) पर पाहन यानी पुजारी द्वारा साल के वृक्ष की पूजा की जाती है और सखुआ फूल चढ़ाए जाते हैं।पूजा के दौरान पाहन दो घड़ों में पवित्र जल और सखुआ की टहनियों से आगामी मानसून और वर्षा का पूर्वानुमान लगाने की परंपरा है।

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