रांचीः झारखंड के प्रतितिष्ठित रांची यूनिवर्सिटी एक बार फिर से विवादों के घेरे में है। इस बार तीन छात्रों को मैनेजमेंट की डिग्री दिलाने के लिए यूनिवर्सिटी ने कानून को जिस तरह से बदला उस पर सवाल खड़े हो रहे है। इनमें से एक राज्य के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर के बेटे प्रशांत किशोर हैं। हालांकि बाद में गलती का अहसास होने पर यूनिवर्सिटी ने डिपाटमेंट लिविंग सर्टिफिकेट (DLC) पर रोक लगा दी है।
मास्टर इन रूरल मैनेजमेंट जैसे प्रोफेशनल कोर्स में अधिकतम 4 साल के भीतर पढ़ाई पूरी करना अनिवार्य है। इसके बाद रजिस्ट्रेशन स्वतः समाप्त हो जाता है। वहीं 2011-13 बैच के छात्रों को एडमिशन लेने के बाद 2021 में फाइनल सेमेस्टर की परीक्षा में शामिल कराया गया। तब तक रजिस्ट्रेशन खत्म हो गया था। इतना ही नहीं, जिन छात्रों का रजिस्ट्रेशन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज) में था, उन्हें दूसरे संस्थान डोरंडा कॉलेज से परीक्षा दिलाई गई। चौंकाने वाली बात यह है कि इसके लिए तीन बड़ी बाधाओं को पार करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने एग्जाम बोर्ड के जरिए रास्ता निकाला। जिस समय फाइनल सेमेस्टर की परीक्षा हुई, उस समय प्रशांत की मां डोरंडा कॉलेज में प्रिंसिपल थीं।
तीन में 2 छात्रों को फर्स्ट क्लास डिस्टिंक्शन… जब परीक्षा प्रक्रिया ही विवादों में है, तो मूल्यांकन की निष्पक्षता भी सवालों के घेरे में आ गई है। तीन में से दो छात्रों को फर्स्ट क्लास डिस्टिंक्शन अंक मिले हैं, जिससे पूरे प्रकरण की पारदर्शिता पर और संदेह गहराया है। जानकारों का कहना है कि लगभग 10 साल पढ़ाई छोड़ने के बाद परीक्षा में शामिल होना और डिस्टिंक्शन अंक प्राप्त संदेह उत्पन्न करता है।
जानिए…कहां-कहां तोड़े गए नियम 1 समय-सीमा का पूरी तरह से किया उल्लंघन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज के सेशन 2011-13 के छात्र प्रशांत किशोर, प्रेम सुदर्शन और राहुल कुमार सिंह ने थर्ड सेमेस्टर तक पढ़ाई पूरी की थी, लेकिन फाइनल परीक्षा नहीं दे सके। नियमानुसार दो वर्षीय कोर्स अधिकतम 4 साल में पूरा करना अनिवार्य है। इसके बाद रजिस्ट्रेशन स्वतः समाप्त हो जाता है। इसके बावजूद 2021 में उन्हें फाइनल सेमेस्टर परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी गई।
2 संस्थान बदला: डोरंडा कॉलेज से परीक्षा मास्टर इन रूरल मैनेजमेंट कोर्स 2011-13 बैच के बाद इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज में बंद हो गया। इसके बावजूद छात्रों को डोरंडा कॉलेज से परीक्षा दिलाई गई, जहां यह कोर्स 2016 में शुरू हुआ। यानी न सिर्फ कोर्स बंद था, बल्कि रजिस्ट्रेशन की वैधता भी खत्म हो चुकी थी। इसके लिए विवि प्रशासन ने एग्जाम बोर्ड को माध्यम बनाकर परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दे दी।
3 नियम के विरुद्ध बना दिया गया डीएलसी डोरंडा कॉलेज से परीक्षा पास करने के बाद छात्र प्रशांत किशोर ने मूल संस्थान यानी आईएमएस से डिपार्टमेंट लिविंग सर्टिफिकेट (डीएलसी) मांगा। नियम के मुताबिक यह सर्टिफिकेट उसी संस्थान से जारी होता है, जहां अंतिम परीक्षा या पढ़ाई हुई हो। संस्थान के निदेशक ने नियमों का हवाला देकर इनकार किया, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन के निर्देश पर तीन दिन पहले अंततः डीएलसी तैयार कर दिया गया।
और…नहीं दिया डीएलसी यूनिवर्सिटी की पीआरओ डॉ. स्मृति सिंह ने कहा कि इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज से प्रशांत किशोर को डीएलसी देने पर रोक लगा दी गई है। चूंकि अंतिम सेमेस्टर की परीक्षा इस संस्थान से नहीं दी, इसलिए यहां से सर्टिफिकेट जारी नहीं किया जा सकता। रजिस्ट्रेशन फेल हो जाने के बाद विशेष स्थिति में परीक्षा बोर्ड में शामिल होने की अनुमति प्रदान की गई थी।
उठ रहे बड़े सवाल… क्या एग्जाम बोर्ड नियमों से ऊपर है? रजिस्ट्रेशन समाप्त होने के बाद परीक्षा की अनुमति किस आधार पर मिली? कोर्स बंद होने के आठ साल बाद दूसरे संस्थान से परीक्षा किस आधार पर कराई गई?



