रांची:झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की संयुक्त स्नातक स्तरीय प्रतियोगिता (सीजीएल) परीक्षा से नियुक्त कर्मियों ने सीआईडी जांच में सामने आ रही गड़बड़ियों, सरकार की कार्रवाई तथा इंटरनेट मीडिया पर हो रही बदनामी पर शनिवार को अपना दर्द बयां किया। कर्मियों ने रांची प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में कहा कि यह गलत है कि उनकी नियुक्ति 35-40 लाख रुपये देकर हुई है। उन्होंने दावा किया कि उन्हें वर्षों की मेहनत और लगन से यह नौकरी मिली है। कर्मियों का दर्द इस बात को लेकर भी था कि उनकी नियुक्ति को लेकर इंटरनेट मीडिया पर तरह-तरह की बातें की जा रही हैं, जिससे उनकी छवि खराब हो रही है। उन्हें अब शक की नजर से देखा जाने लगा है। परिवार भी परेशान है। वे मानसिक और सामाजिक परेशानी से जूझ रहे हैं।
सीजीएल परीक्षा के माध्यम से राज्य सरकार के विभिन्न विभागों व कार्यालयों में सहायक प्रशाखा पदाधिकारी व अन्य पदों पर नियुक्त कर्मियों ने कहा कि उन्हें सीबीआई या अन्य जांच से परहेज नहीं है, लेकिन जांच निष्पक्ष हो जांच में वे दोषी पाए जाते हैं तो उनपर कार्रवाई हो।कोई भी निर्णय भीड़ के दबाव में न हो। केवल भीड़ के दबाव में पूरी परीक्षा रद करना उचित नहीं है। नियुक्त कर्मियों दे दावा किया कि सीजीएल परीक्षा के माध्यम से 500 से अधिक आदिवासी छात्रों का चयन हुआ है।

अधिसंख्य झारखंड के निवासी हैं। कई ऐसे हैं जो दूसरी नौकरी छोड़कर इसमें नियुक्त हुए। कई कर्मी ऐसे हैं जो दोबारा परीक्षा की तैयारी का जोखिम नहीं ले सकते हैं। सफल अभ्यर्थियों में से एक जावेद ने दावा किया कि कई छात्रों ने वर्षों की मेहनत के बाद सफलता पाई है। लेकिन, अब उनपर पैसे की बदौलत नौकरी हासिल करने के आरोप लगाए जा रहे हैं। एक सफल अभ्यर्थी ने कहा कि 10 वर्षों के बाद सरकार की ओर से इस परीक्षा का सफल आयोजन किया गया है। अब अगर मामला लटका तो परेशानी बढ़ जाएगी। सफल अभ्यर्थियों ने कहा कि वे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों से आते हैं। 35 से 40 लाख रुपये देकर नौकरी कैसे ले सकते हैं? अभ्यर्थियों ने कहा कि मामले की जांच सीआईडी कर रही है और कोर्ट में भी मामला चल रहा है।ऐसे में जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। बताते चलें कि राज्य सरकार के आदेश पर सीजीएल परीक्षा में कथित गड़बड़ी की दोबारा सीआईडी जांच चल रही है।अबतक की जांच में गड़बड़ियों की पुष्टि भी हुई है। इधर, राज्य सरकार ने इस परीक्षा को रद कर दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने सरकार के इस आदेश पर रोक लगा दी। सभी कर्मियों को वापस काम पर भी रख लिया गया है।
ITBP की नौकरी छोड़कर आए चंद्रो हैबुरू हुए भावुक
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ASO के पद पर चयनित अभ्यर्थी चंद्रो हैबुरू ने अपनी व्यक्तिगत कहानी साझा की।उन्होंने बताया कि वह कोल्हान के एक आदिवासी परिवार से आते हैं और चाईबासा के रहने वाले हैं। उनके मुताबिक, उनके पिता की मौत पेड़ से गिरने के कारण हुई थी और संघर्ष करते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई और करियर बनाया। चंद्रो हैबुरू ने कहा, “मैं कहां से 35 लाख रुपये दूंगा? मुझे बदनाम किया जा रहा है. मैं ITBP की नौकरी से इस्तीफा देकर यहां आया हूं।” अपनी बात रखते हुए चंद्रो हैबुरू भावुक हो गए और रो पड़े। उन्होंने कहा कि आज उनके जैसे अभ्यर्थियों को अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए सार्वजनिक रूप से सामने आना पड़ रहा है।
कटऑफ को लेकर भी अभ्यर्थियों ने उठाया सवाल
अभ्यर्थियों ने पेपर लीक के आरोपों के बीच परीक्षा के कटऑफ को लेकर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि अगर बड़े पैमाने पर पेपर लीक हुआ होता, तो कटऑफ को लेकर भी अलग तस्वीर सामने आती। उन्होंने सवाल उठाया कि कथित पेपर लीक के बावजूद कटऑफ करीब 33 % के आसपास कैसे रहा। हालांकि, कटऑफ के आधार पर पेपर लीक के आरोपों को खारिज या साबित नहीं किया जा सकता। यह मामला जांच का विषय है।
सरकार से क्या है अभ्यर्थियों की मांग?
अभ्यर्थियों ने सरकार से मांग की कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जांच पर किसी तरह के बाहरी दबाव का असर नहीं होना चाहिए।
अभ्यर्थियों की प्रमुख मांगें
- जांच निष्पक्ष तरीके से हो और किसी पूर्वाग्रह के साथ न की जाए।
- सीआईडी या किसी भी सक्षम जांच एजेंसी की जांच का वे सामना करने को तैयार हैं।
- अगर किसी व्यक्ति की नियुक्ति में अनियमितता साबित होती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो।
- गलत तरीके से चयनित व्यक्ति की गलती की सजा सभी चयनित अभ्यर्थियों को न दी जाए।
- जांच के दौरान नियुक्त अभ्यर्थियों की सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य को भी ध्यान में रखा जाए।





