रांची : डिजिटल इंडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के तेजी से बढ़ते दौर में देश की आदिवासी भाषाओं को बचाने की चुनौती लगातार गंभीर होती जा रही है। भारत की 197 से अधिक जनजातीय भाषाएं आज विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही हैं। ऐसे समय में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (डीएसपीएमयू), रांची के इंटरनेशनल डॉक्युमेंटेशन सेंटर (आईडीसी) द्वारा आयोजित कोल्लाबोरेटिव डिजिटल आरचिविंग ओरिएंटेशन प्रोग्राम आदिवासी भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बनकर सामने आया। कार्यक्रम में लोहरदगा लोकसभा क्षेत्र के सांसद सुखदेव भगत बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सांसद सुखदेव भगत ने कहा कि आदिवासी भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की पहचान, संस्कृति और इतिहास की आत्मा हैं। उन्होंने कहा कि जब कोई भाषा खत्म होती है तो केवल शब्द नहीं मरते, बल्कि पूरी सभ्यता मौन हो जाती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि डिजिटल युग में आदिवासी भाषाओं को तकनीक से जोड़ना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। यदि इन भाषाओं को इंटरनेट, डिजिटल प्लेटफॉर्म और शिक्षा व्यवस्था से नहीं जोड़ा गया, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी विरासत को केवल पुस्तकों या संग्रहालयों में खोजती रह जाएंगी। उन्होंने कहा कि जिस देश ने चांद तक पहुंचने का साहस दिखाया है, वह अपनी आदिवासी भाषाओं को डिजिटल दुनिया में सम्मानजनक स्थान दिलाने में भी सक्षम है। इसके लिए सरकार, शिक्षण संस्थानों और समाज को मिलकर काम करना होगा ताकि जंगलों और गांवों में बोली जाने वाली भाषाएं भी इंटरनेट और मोबाइल स्क्रीन तक पहुंच सकें।

यह कार्यक्रम इंडियाना यूनिवर्सिटी (ब्लूमिंगटन), यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ टेक्सास तथा की-स्टोन फाउंडेशन (इंडिया) के सहयोग से आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य आधुनिक डिजिटल तकनीकों के माध्यम से लुप्तप्राय जनजातीय भाषाओं का दस्तावेजीकरण और नैतिक रूप से डिजिटल आर्काइविंग करना है। विशेषज्ञों ने कहा कि अधिकांश आदिवासी भाषाएं मौखिक परंपरा पर आधारित हैं और लिखित सामग्री, यूनिकोड फॉन्ट, कीबोर्ड तथा डिजिटल डिक्शनरी के अभाव में धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं। बुजुर्ग पीढ़ी के साथ कई बोलियां भी खत्म होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि डिजिटल इंडिया की बात तो की जाती है, लेकिन आज भी कई आदिवासी भाषाओं को यूनिकोड, डिजिटल कीबोर्ड और डेटा इकोसिस्टम में स्थान नहीं मिल पाया है। उन्होंने कहा कि यदि इन भाषाओं को स्कूलों के पाठ्यक्रम और डिजिटल लाइब्रेरी से नहीं जोड़ा गया, तो आर्काइविंग केवल डेटा स्टोरेज बनकर रह जाएगी।

कार्यक्रम के दौरान एआई आधारित स्पीच-टू-टेक्स्ट टूल्स, डिजिटल डिक्शनरी, ई-लाइब्रेरी और डिजिटल डॉक्युमेंटेशन जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नई पीढ़ी और आदिवासी विरासत के बीच एक मजबूत सेतु बन सकता है। इस अवसर पर इंडियाना यूनिवर्सिटी की प्रो. शोभाना चेल्लिआह, फुलब्राइट-नेहरू स्कॉलर मेरी गिरार्ड, आईडीसी के निदेशक अभय एस मिंज तथा डीएसपीएमयू के कुलपति राजीव मनोहार , के अब्बास डीन सहित कई शिक्षाविद और विशेषज्ञ मौजूद रहे। कार्यक्रम का मंच संचालन दीक्षा जी ने किया की। कार्यक्रम के दौरान अभिनव सिद्धार्थ को फील्ड कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी दिया गया। कार्यक्रम में यह संदेश प्रमुखता से उभरकर सामने आया कि डिजिटल प्रिजर्वेशन केवल फाइल तैयार करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक विरासत को बचाने का अभियान है। विशेषज्ञों ने कहा कि भारत की विविधता का असली परीक्षण संसद में नहीं, बल्कि सर्वर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगा। आदिवासी भाषाओं को संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि भविष्य की शक्ति बनाना होगा।



