खूंटीः एंथोनी ओड़िया घनघोर बारिश के इस मौसम में जंगल में घूमते हुए दिख जाते हैं। सुबह होते ही निकल जाते हैं जंगल की ओर । पांव में हवाई चप्पल, हाथ में छाता और दाती । कभी-कभी घर से खाना मिल जाता है तो रख लेते हैं नहीं तो जंगली फल ही खा लेते हैं । एंथोनी 400 एकड़ में फैले इस जंगल के एकतमात्र रखवाले हैं। एंथोनी को तनख्वाह सरकार से नहीं मिलती। हर मुंडा घर से 10 पइला चावल और 20 रुपए सालाना देता है। उन्हें मुंडा समाज ने इस साल का ‘बिर होरो नी:’ चुना है।
‘बिर होरो नी: यानी जंगल का रखवाला
‘बिर होरो नी’ यानी जंगल का रखवाला। एंथोनी ओडिया खूंटी जिले के मुरहू प्रखंड के हेठगोवा गांव में रहते हैं। इस गांव में चार टोले हैं मुंडाटोली, एदेलडीह, पाहनटोली और लोआडीह। गांव के 400 एकड़ में घने जंगल हैं। साल, आम, जामुन, केंदू, कटहल, महुआ समेत तमाम तरह की झाड़ियां, जंगली कंद-मूल यहां मिलते हैं। इसके साथ ही जंगली जानवर, मोर और विषैल सांपों की भरमार है ।

आदिवासी समाज का अपना फॉरेस्टर
‘बिर होरो नी: आदिवासी समाज के स्वशासन व्यवस्था का सर्वोत्तम उदाहरण है । जंगल की रक्षा के लिए वे किसी सरकार के भरोसे नहीं । ना ही उन्हें वन अधिकारियों की चिरौरी करनी की जरुरत होती है । आदिवासी समाज अपने जल-जंगल जमीन की रक्षा ‘बिर होरो नी: जैसी परंपरागत पद्धतियों से करता आ रहा है । एंथोनी ओडिया को इस बार जंगल की रखवाली की जिम्मेदारी दी गई है ।
जंगल में चलता है एंथोनी का हुक्म
एंथोनी ओडिया के पास भले ही कागजी कानून की कोई शक्ति नहीं हो लेकिन 400 एकड़ में फैले इस जंगल में उनका ही हुक्म चलता है । उनकी इजाजत और ग्राम सभा की मंजूरी के बिना एक पेड़ तो क्या पत्ता तक नहीं तोड़ा जा सकता है । ‘बिर होरो नी: एंथोनी सैकड़ों वर्षों पुरानी उस परंपरा के वाहक हैं जिसका काम है प्रकृति की रक्षा करना । वे अपना काम शिद्दत से करते हैं । जंगल की हर पगडंडी उन्हें पहचानती है ।

खतरों के बीच रखवाली
अक्सर एंथोनी ओड़ेया को सामना करैत जैसे विषैले सांपों से हो जाता है । डर तो उन्हें लगता है लेकिन सांपों को बिना नुकसान पहुंचाए वो पैदल घूमते रहते हैं। बरसात उनके लिए सबसे मुसीबत वाला मौसम होता है । वे कहते हैं उनका बचपन इस जंगल में गुजरा वे इससे प्यार करते हैं । जंगल की रक्षा करना उनकी नैतिक और भावनात्मक जिम्मेदारी है ।

‘बिर होरो नी: को कितनी सैलरी ?
जरुरत से ज्यादा लड़की नहीं काटे जाते
इस जंगल की सुरक्षा के लिए चार पंचों का भी चयन किया गया है, जिसमें लोआडीह के सिरिल ओड़ेया, एदेलडीह के हालू ओड़ेया, पाहनटोली के जोनसन ओड़ेया और मुंडाटोली के मुकुल ओड़ेया के नाम शामिल हैं। जंगल से जलावन के लिए लकड़ी काटने पर प्रतिबंध है। शादी-व्याह या घर बनाने के लिए किसी को लकड़ी की जरूरत पड़ती है, तो वे पहले ग्रामसभा में अपना प्रस्ताव रखते हैं, जिसके बाद उसे पंच के पास भेजा जाता है। पंच की अनुमति के बाद गांव के लोग अपनी जरूरत के अनुसार लकड़ियां काटते हैं।

चोरी से लकड़ी काटा तो पांच हजार रुपए का जुर्माना
ग्रामसभा ने यह प्रावधान बना रखा है कि अगर कोई भी व्यक्ति बिना ग्रामसभा व पंच के अनुमति के जंगल से लकड़ी काटते पकड़ा जाता है, तो उसे ग्रामसभा में 5000 रुपए जुर्माना भरना पड़ता है। जंगल बचाने की मुंडाओं की इस पारंपरिक पद्यति के कारण आज भी बुरूमा गांव का जंगल सुरक्षित है।


