रांचीः आठ सितंबर 2021 को आजसू पार्टी द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास का घेराव किया गया था। इस मामले में अदालत द्वारा आये एक फैसले के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सात मार्च 2022 को एमपी-एमएलए कोर्ट में आत्मसमर्पण करने वाले आजसू पार्टी के छह नेताओं में से एक गोमिया के पूर्व विधायक लंबोदर महतो को राहत मिल गई है, जबकि पार्टी अध्यक्ष सुदेश महतो समेत पांच अन्य नेताओं के खिलाफ आरोप बरकरार रखे गए हैं।अदालत के इस फैसले के बाद इस पूरे प्रकरण की जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। यह मामला आठ सितंबर 2021 को मुख्यमंत्री आवास घेराव के दौरान दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा है। उस दिन आजसू पार्टी ने पिछड़े वर्ग से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदर्शन किया था।
आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान भीड़ उग्र हो गई थी और सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश में कई पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। तत्कालीन अंचलाधिकारी विजय केरकेट्टा की शिकायत पर लालपुर थाने में सुदेश महतो, सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी, लंबोदर महतो, रामचंद्र सहिस, शिवपूजन महतो सहित छह नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इस मामले में पुलिस ने लालपुर थाना में कांड संख्या- 201/2021 के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी। उसमें डॉ देवशरण भगत, शिवपूजन कुशवाहा, रामचंद्र सहिस, सुदेश महतो, चंद्रप्रकाश चौधरी, लंबोदर महतो व अन्य को आरोपी बनाया गया था।
पुलिस ने सभी नेताओं पर दंगा, सरकारी कार्य में बाधा, पुलिसकर्मियों से मारपीट और निषेधाज्ञा उल्लंघन की धाराओं के तहत केस दर्ज किया था। बाद में झारखंड उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी आरोपितों को सशर्त जमानत दी थी।अदालत ने पीड़ित पुलिसकर्मियों को कुल 80 हजार रुपये मुआवजा देने और मोबाइल नंबर नहीं बदलने जैसी शर्तें लगाई थीं। इसके बाद पांच मार्च 2022 को सभी नेताओं ने निचली अदालत में सरेंडर किया था और 25-25 हजार रुपये के मुचलके पर उन्हें जमानत मिल गई थी।
23 अप्रैल को मामले में आया नया मोड़
मामले में नया मोड़ तब आया जब 23 अप्रैल को अदालत ने आरोप तय करने की प्रक्रिया पूरी की। अदालत ने छह में से केवल पांच नेताओं के खिलाफ आरोप तय किए।लंबोदर महतो की ओर से अदालत में विधानसभा उपस्थिति रजिस्टर प्रस्तुत किया गया, जिसमें दावा किया गया कि घटना के समय वह विधानसभा सत्र में मौजूद थे। इसी दस्तावेज के आधार पर अदालत ने उन्हें आरोपमुक्त कर दिया।हालांकि, इस फैसले के बाद विवाद गहरा गया है। प्रदर्शन के वक्त ली गई तस्वीरों में लंबोदर महतो की उपस्थिति प्रतीत हो रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या केवल उपस्थिति रजिस्टर के आधार पर उन्हें राहत दी जा सकती है।यह भी कहा जा रहा है कि जिस दिन सुदेश महतो ने भी विधानसभा में उपस्थिति दर्ज कराई थी, उस तथ्य को उन्हें राहत देने के लिए क्यों नहीं माना गया।



