डेस्कः नेपाल के त्रिशूली समेत कई नदियों में आई बाढ़ का पानी बिहार पहुंच गया है। बाढ़ के इस पानी में विशालकाय मछलियां भी बहकर बिहार आ रही है। 90 से 100 किलो की इन मछलियों को पानी का बाघ यानी बाघड़ मछलियां कहा जाता है। इसे स्थानीय तौर पर गोइता और बाघड़ भी कहा जाता है। यह तेज बहाव वाली नदियों में रहने वाली शिकारी मछली है। इसके आदमखोर होने की बात को वैज्ञानिक मिथक मानते हैं, लेकिन बाढ़ के गंदे पानी और मरे हुए जीवों के संपर्क में आने के कारण ऐसी मछलियों को खाने से स्वास्थ्य संबंधी खतरा हो सकता है। इसकी जानकारी मिलने के बाद बिहार सरकार ने लोगों को इन मछलियों को खाने से बचने की सलाह दी है। साथ ही प्रशासन को इनके खरीद-बिक्री पर रोक सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।

बिहार में बाढ़ के पानी के साथ पहुंची ‘बाघड़’ मछलियां!
नेपाल की ओर से बाढ़ के पानी के साथ बिहार पहुंची असामान्य मछलियां
ऐसी मछलियों के सेवन से लोगों के बीमार पड़ने की सूचना के बाद मत्स्य विभाग ने जारी की विशेष एडवाइजरी। #Bihar #NepalFloods pic.twitter.com/ssaVM5tzA1
— Live Dainik (@Live_Dainik) September 2, 2026
‘पानी का बाघ’ है ये विशाल शिकारी मछली
नेपाल के रसुवा इलाके में अचानक बाढ़ आई, पहाड़ फटा, पानी का भयंकर सैलाब त्रिशूली से नारायणी होता हुआ भारत की गंडक नदी में घुस गया। और उस पानी के साथ लकड़ियां बह कर आईं, गैस सिलिंडर बह कर आए, मलबा बह कर आया, शव भी बहकर आने की ख़बरें आईं। और साथ में आईं बड़ी-बड़ी मछलियां।ऐसी विशाल मछलियां खास तौर पर बिहार के गोपालगंज और पश्चिम चंपारण के इलाकों में दिखाई दे रही हैं। गोपालगंज के मंगलपुर घाट, बगहा और वाल्मीकिनगर में मछुआरे उस समय हैरान रह गए, जब उन्हें नदियों में 15, 27, 40 और करीब 100 किलो तक वजन वाली मछलियां मिलने लगीं। इन विशाल मछलियों को देखकर स्थानीय लोगों में कौतूहल है। कुछ मछुआरे इन्हें पकड़कर तौल रहे हैं और बाजार में बेचने की कोशिश भी कर रहे हैं। इधर, बिहार के डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए कहा है कि बाढ़ के पानी के साथ आईं इन अनजान और असामान्य मछलियों को न खाया जाए, न खरीदा जाए और न ही बेचा जाए। माना जा रहा है कि नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने वहां की नदियों की गहरी तलहटी में रहने वाली बड़ी मछलियों को तेज बहाव के साथ बहाकर बिहार के मैदानी इलाकों तक पहुंचा दिया है।

90-100 किलो की ‘बाघड़’ मछली ने चौंकाया
नेपाल की नदियों से बिहार में पहुंचने वाली इन मछलियों को स्थानीय स्तर पर गूंछ, गोइता और बाघड़ जैसे नामों से जाना जाता है। इन्हें ‘पानी का बाघ’ भी कहा जाता है, जिसके चलते कई जगहों पर इसका नाम बाघड़ प्रचलित है। इसका वैज्ञानिक नाम ‘Bagarius yarrelli’ है। कुछ स्थानों पर इसे डेविल कैटफिश भी कहा जाता है। यह बिहार में आम तौर पर मिलने वाली रोहू या कतला जैसी मछली नहीं है, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की तेज बहाव वाली नदियों में पाई जाने वाली शिकारी मछली है। यह मांसाहारी प्रजाति छोटी मछलियों को अपना शिकार बनाती है। इसके अलावा यह मेंढक, केकड़े, झींगे और अन्य जलीय जीवों को भी खाती है। यह मछली करीब दो मीटर तक लंबी हो सकती है और इसका वजन 90-100 किलो तक होना असामान्य नहीं है।कुछ मामलों में इसका वजन इससे भी अधिक हो सकता है।देखने में ही काफ़ी डरावनी लगती है। सिर चौड़ा और चपटा होता है, जैसे किसी ने उसे ऊपर से दबा दिया हो। मुंह बहुत बड़ा, दांत पीछे की ओर मुड़े हुए काफ़ी तीखे होते हैं, जैसे फंस जाए तो छोड़ें नहीं। चार जोड़ी मूंछें लटक रही होती हैं इसकी। और ये मूछें असल में इसके सेंसर होते हैं जो गंदे पानी में भी शिकार को सूंघ लेते हैं। शरीर इसका लंबा होता है, आगे से मोटा और पीछे से पतला। भूरे, पीले और हरे रंगों की चित्तियां होती हैं इसके शरीर पर, जिसका फ़ायदा उठाकर ये नदी की गहराई में पत्थरों में छिप जाती है और घात लगा कर शिकार करती है। पेट सफेद होता है। और इसकी चमड़ी पर खुरदरी पपड़ी जैसी परत होती है। यानी देखने में डरावनी लगती है, बहुत डरावनी लगती है, भयावह लगती है। ये आई है वहां से बाढ़ के बाद। क्योंकि गूंध ऊपर पहाड़ों की नदियों की गहरी तलहटी में रहती है। तेज़ धारा ऊपर से बहती रहती है, ये नीचे तल पर रहती है पानी में। इसे ऑक्सीजन वाला तेज बहता पानी चाहिए। मैदान की शांत नदी उसका घर नहीं।
क्यों खाने से रोका जा रहा, क्या है इस मछली का इतिहास
कुछ लोगों के बीमार पड़ने की खबर भी आई। उल्टियां हुईं, दस्त हुए, पेट दर्द हुआ। तो एक तो इसलिए चेतावनी है, इसलिए हिदायत है, इसलिए सलाह है कि जब तक पानी साफ न हो जाए, ऐसी मछली मुंह में मत डालो। लेकिन साथ में कई तरह की कहानियां भी हैं इसको लेकर। हालांकि वैज्ञानिक बताते हैं कि ये अपने आप में ज़हरीली नहीं होती, लेकिन बाढ़ की गंदगी इसको ज़हरीला बना सकती है। अफवाहें को इसके बारे में ये तक हैं कि ये आदमख़ोर होती है। और ये एक पुराना मिथक है। वो कहां से आया? तो हुआ ये था कि काली नदी में, नेपाल-भारत सीमा पर, 1998 से 2007 के बीच कुछ लोग तैरते हुए गायब हो गए थे। किसी का शव तक नहीं मिला था। उस इलाक़े में ये फैल गया था कि गूंछ ने उन लोगों को खा लिया। कहने लगे कि श्मशान के पास नदी में अधजले शव डाले जाने पर और अस्थि विसर्जन करने पर, मछली उस सड़े हुए मांस की आदी हो गई, और फिर जीवित इंसान को भी शिकार समझने लगी।





