रांची। झारखंड के खनिज संसाधनों और राज्य के वित्तीय अधिकारों को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र सरकार के खिलाफ संवैधानिक मोर्चा खोल दिया है। Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को लेकर मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को अलग-अलग पत्र लिखकर झारखंड की चिंताओं को सामने रखा है।

- धारा 9D पर सबसे बड़ी आपत्ति
- क्लॉज 2 और 3 को भी हटाने या सीमित करने की मांग
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बनाया आधार
- झारखंड के लिए ₹13 हजार करोड़ से ज्यादा का सवाल
- ‘मंईयां सम्मान योजना’ का भी किया जिक्र
- रेट्रोस्पेक्टिव प्रभाव पर भी सवाल
- ओडिशा और कर्नाटक का भी दिया उदाहरण
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी लिखा पत्र
- राहुल गांधी से समर्थन की अपील
- ‘मौजूदा स्वरूप में विधेयक आगे न बढ़े’
मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से विधेयक पर पुनर्विचार करने और इसे मौजूदा स्वरूप में आगे नहीं बढ़ाने की अपील की है। वहीं राष्ट्रपति से विधेयक के संवैधानिक, संघीय, वित्तीय और सामाजिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार करने तथा राहुल गांधी से इस मुद्दे पर समर्थन और हस्तक्षेप की मांग की है।

धारा 9D पर सबसे बड़ी आपत्ति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे गए पत्र में हेमंत सोरेन ने विधेयक में प्रस्तावित Section 9D को लेकर गंभीर संवैधानिक आपत्ति जताई है। उनके मुताबिक, इस प्रावधान से राज्य सरकारों की खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर टैक्स, सेस अथवा अन्य लेवी लगाने की शक्ति केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रतिबंधों के अधीन हो सकती है।

मुख्यमंत्री का तर्क है कि इससे झारखंड जैसे खनिज उत्पादक राज्यों के वित्तीय और विधायी अधिकार प्रभावित होंगे। उन्होंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि धारा 9D को कम से कम “mineral rights” तक सीमित किया जाए और इसे “mineral-bearing lands” तक विस्तार देने वाले हिस्से को हटाया जाए।
क्लॉज 2 और 3 को भी हटाने या सीमित करने की मांग
हेमंत सोरेन ने सिर्फ धारा 9D पर ही सवाल नहीं उठाया है। उन्होंने विधेयक के Clause 2 और Clause 3 पर भी आपत्ति दर्ज की है।
मुख्यमंत्री के मुताबिक, इन प्रावधानों के जरिए खनिज-युक्त भूमि को केंद्र के घोषित नियंत्रण के तहत लाने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि भूमि पर कराधान का विषय संविधान की राज्य सूची की Entry 49 के तहत राज्यों को मिला हुआ है। ऐसे में खनिज-युक्त भूमि पर केंद्र का नियामकीय नियंत्रण बढ़ाना संवैधानिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
उन्होंने प्रधानमंत्री से मांग की है कि क्लॉज 2 और 3 को हटाया जाए या उनका दायरा उपयुक्त रूप से सीमित किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बनाया आधार
झारखंड सरकार ने अपनी आपत्तियों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ के Mineral Area Development Authority & Anr. vs Steel Authority of India Ltd. & Ors. मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया है।
मुख्यमंत्री के पत्र के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य विधानसभाओं की उस शक्ति को मान्यता दी थी, जिसके तहत Entry 49, List II के अंतर्गत खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी माना था कि खनिज का मूल्य या उत्पादन कराधान के माप के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसी संवैधानिक स्थिति के आधार पर झारखंड विधानसभा ने Jharkhand Mineral Bearing Land Cess Act, 2024 पारित किया था और बाद में इसके नियम भी बनाए गए। मुख्यमंत्री का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्यता प्राप्त राज्य की इस शक्ति को व्यावहारिक रूप से सीमित कर सकता है।
झारखंड के लिए ₹13 हजार करोड़ से ज्यादा का सवाल
मुख्यमंत्री ने खनिज राजस्व को झारखंड की वित्तीय क्षमता का महत्वपूर्ण आधार बताया है। पत्र में राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा गया है कि वर्ष 2024-25 में खनन राजस्व राज्य के अपने गैर-कर राजस्व का लगभग 84.9 प्रतिशत था।
वहीं Mineral Bearing Land Cess से करीब ₹1,379 करोड़ वर्ष 2024-25, ₹7,488 करोड़ वर्ष 2025-26 में प्राप्त होने और मौजूदा रुझानों के आधार पर 2026-27 में लगभग ₹13,215 करोड़ की प्राप्ति का अनुमान जताया गया है।
हेमंत सोरेन का कहना है कि यह पैसा केवल सरकारी खजाने में जमा होने वाला राजस्व नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, ग्रामीण विकास, सामाजिक सुरक्षा, आधारभूत संरचना और कमजोर वर्गों के कल्याण में किया जा रहा है।
‘मंईयां सम्मान योजना’ का भी किया जिक्र
मुख्यमंत्री ने पत्र में राज्य की कल्याणकारी योजनाओं का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है कि खनिज से मिलने वाली वित्तीय क्षमता ने राज्य को बड़े पैमाने पर सामाजिक कल्याण और विकास कार्यक्रम चलाने में मदद की है।
पत्र में मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि यह योजना 50 लाख से अधिक महिलाओं को लाभ पहुंचा रही है। मुख्यमंत्री के मुताबिक, खनिज से जुड़े राजस्व ने राज्य की व्यापक कल्याणकारी क्षमता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
रेट्रोस्पेक्टिव प्रभाव पर भी सवाल
हेमंत सोरेन ने विधेयक में प्रस्तावित पूर्वव्यापी (retrospective) प्रभाव वाले प्रावधान को भी गंभीर चिंता का विषय बताया है। उनके मुताबिक, विधेयक में ऐसा प्रावधान है जिसके तहत संशोधन लागू होने से पहले राज्य द्वारा लगाए गए और जिन टैक्स, सेस या अन्य लेवी का भुगतान नहीं हुआ या जिनकी वसूली नहीं हो सकी, उन्हें सभी परिस्थितियों में अमान्य माना जा सकता है। मुख्यमंत्री का कहना है कि इससे राज्य कानून के तहत पैदा हुए वैध सांविधिक दावों और लंबित बकायों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने मांग की है कि यदि किसी संक्रमणकालीन व्यवस्था की जरूरत हो तो सुप्रीम कोर्ट के graduated relief वाले दृष्टिकोण के अनुरूप व्यवस्था की जाए, न कि एकमुश्त पूर्वव्यापी समाप्ति की जाए।
ओडिशा और कर्नाटक का भी दिया उदाहरण
हेमंत सोरेन ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि यह केवल झारखंड का मुद्दा नहीं है। ओडिशा और कर्नाटक समेत अन्य खनिज उत्पादक राज्य भी प्रस्तावित बदलाव से प्रभावित हो सकते हैं। झारखंड सरकार ने इन राज्यों के साथ संरचित विचार-विमर्श की पेशकश की है। मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया है कि किसी भी शर्त या प्रतिबंध को लागू करने से पहले खनिज उत्पादक राज्यों के साथ GST Council जैसी परामर्श प्रक्रिया के आधार पर चर्चा की जानी चाहिए।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी लिखा पत्र
मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखे पत्र में झारखंड के आदिवासी और खनन प्रभावित समुदायों की चिंताओं को प्रमुखता से रखा है।उन्होंने कहा कि दशकों से जारी खनन के कारण झारखंड के लोगों, खासकर आदिवासी समुदायों को विस्थापन, भूमि से वंचित होने, पर्यावरणीय क्षति, प्रदूषण, पारंपरिक आजीविका के नुकसान और सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति से विधेयक के संवैधानिक, संघीय, वित्तीय और सामाजिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार करने का अनुरोध किया है।
राहुल गांधी से समर्थन की अपील
मुख्यमंत्री ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को भी पत्र लिखकर इस मुद्दे पर समर्थन मांगा है। पत्र में उन्होंने कहा है कि संसद के दोनों सदनों से विधेयक पारित हो चुका है और अब उन्होंने राष्ट्रपति के समक्ष भी झारखंड की चिंताएं रखी हैं। राहुल गांधी को लिखे पत्र में हेमंत सोरेन ने कहा कि मामला सिर्फ राजस्व का नहीं बल्कि संघवाद, राज्यों की विधायी शक्तियों और केंद्र-राज्य के संवैधानिक संतुलन का है।उन्होंने राहुल गांधी से इस मुद्दे को उचित मंच पर उठाने, केंद्र सरकार के साथ चर्चा करने और राज्यों के वित्तीय अधिकारों, सहकारी संघवाद तथा खनन प्रभावित समुदायों के हितों की रक्षा के प्रयासों का समर्थन करने की अपील की है।
‘मौजूदा स्वरूप में विधेयक आगे न बढ़े’
प्रधानमंत्री को भेजे पत्र के अंत में मुख्यमंत्री ने साफ तौर पर अपील की है कि Draft Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को सहकारी संघवाद, संवैधानिक संतुलन, वित्तीय स्थिरता और झारखंड की जनता की विकास संबंधी आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए मौजूदा स्वरूप में आगे न बढ़ाया जाए। वैकल्पिक स्थिति में झारखंड सरकार ने धारा 9D को केवल संविधान की राज्य सूची की Entry 50 के तहत आने वाले “mineral rights” तक सीमित रखने, “mineral-bearing lands” तक उसके विस्तार को हटाने और पूर्वव्यापी बकायों के लिए संक्रमणकालीन व्यवस्था की मांग रखी है। साथ ही, राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित होता है तो वह अपने संवैधानिक और कानूनी उपायों का इस्तेमाल करने का अधिकार सुरक्षित रखेगी।
अब लड़ाई सिर्फ खनिज राजस्व की नहीं
हेमंत सोरेन की तीनों चिट्ठियों से साफ है कि झारखंड सरकार इस मुद्दे को केवल टैक्स या राजस्व के सवाल के रूप में नहीं देख रही। राज्य सरकार इसे संघवाद, राज्यों के संवैधानिक अधिकार, खनिज उत्पादक राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और खनन प्रभावित समुदायों के हितों से जोड़ रही है।
अब देखना होगा कि केंद्र सरकार झारखंड की इन आपत्तियों पर क्या रुख अपनाती है और क्या प्रस्तावित खनिज कानून में राज्यों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए बदलाव किया जाता है।






