रांची: महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग, अंतर्गत झारखंड महिला विकास समिति एवं समाज कल्याण निदेशालय द्वारा न्यायिक अकादमी, रांची में “बाल विवाह मुक्त झारखंड” विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण सह कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में पहली बार राज्यभर के सभी एसडीओ और डीएसडब्ल्यूओ को बाल विवाह निषेध अधिकारी (सीएमपीओ) के रूप में प्रशिक्षित किया गया।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि झारखंड सरकार की मुख्य सचिव अलका तिवारी रहीं। उनके साथ महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग के सचिव मनोज कुमार, न्यायिक अकादमी के निदेशक, यूनिसेफ झारखंड की प्रमुख डॉ. कनिनिका मित्रा और समिति की परियोजना निदेशक-सह-निदेशक समाज कल्याण किरण कुमारी पासी मंच पर उपस्थित रहीं।
मुख्य सचिव ने कहा कि स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद भी बाल विवाह की समस्या बनी रहना चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि बाल विवाह एक दंडनीय अपराध है और इसके प्रति समुदाय को जागरूक करना बेहद जरूरी है। उन्होंने अधिकारियों, मीडिया और नागरिक समाज संगठनों से इस सामाजिक कुरीति को समाप्त करने में सहयोग की अपील की।
विभागीय सचिव मनोज कुमार ने बालिकाओं की शिक्षा, जीवन कौशल एवं रोजगारपरक प्रशिक्षण पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सावित्रीबाई फुले किशोरी समृद्धि योजना और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएँ बालिकाओं को सशक्त बनाने और बाल विवाह की रोकथाम में मददगार हैं।
यूनिसेफ की डॉ. कनिनिका मित्रा ने कहा कि बाल विवाह रोकथाम के प्रयासों में लड़कियों के साथ-साथ लड़कों को भी शामिल करना चाहिए, ताकि समाज में समानता की भावना बचपन से ही विकसित हो।
कार्यक्रम में 10 किशोरी चैंपियनों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने साहस दिखाते हुए न सिर्फ अपना बाल विवाह रोका बल्कि अन्य नाबालिग बालिकाओं के विवाह रुकवाने में भी मदद की।
इस कार्यशाला में 34 एसडीओ, 9 डीएसडब्ल्यूओ, 5 सीडीपीओ, 19 एडीएसएस, 14 विभागीय प्रतिनिधि, 39 एनजीओ और 14 मीडिया प्रतिनिधियों ने भाग लिया।झारखंड में बाल विवाह की दर 32.2% है, जो राष्ट्रीय औसत 23% से अधिक है। संथाल परगना के जामताड़ा, देवघर और गोड्डा जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। विशेषज्ञों ने बाल विवाह रोकथाम के लिए चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 और महिला हेल्पलाइन 181 के उपयोग पर जोर दिया।








