सीरियाः इजराइल और सीरिया के बीच चला आ रहा तनाव उस वक्त चरम पर पहुंच गया जब नेतन्याहू की सेना राजधानी दमिश्क पर हमला कर दिया । यह हमला सीरिया के मिलिट्री हेडक्वार्टर पर हुआ है । बताया जा रहा है कि इजराल के बम प्रेसिडेंसियल पैलेस के पास भी गिरे हैं।
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबकि इजराइल ने सीरिया की राजधानी दमिश्क के केंद्र में कई हवाई हमले किए, वहीं दक्षिण-पश्चिमी शहर स्वैदा में सरकार और द्रूज़ सशस्त्र समूहों के बीच संघर्षविराम टूटने के बाद झड़पें जारी रहीं। इज़राइल के रक्षा मंत्री इसराइल काट्ज़ ने बताया कि इज़राइली सेना ने सीरियाई रक्षा मंत्रालय के प्रवेश द्वार के पास हमला किया। यह कार्रवाई उस वक्त हुई जब उन्होंने स्वैदा से सीरियाई सेना को पीछे हटने की चेतावनी दी थी। एक अन्य हमला दमिश्क के बाहरी इलाके में स्थित राष्ट्रपति भवन के पास हुआ।
BREAKING:
This is not Gaza.
This is not Beirut.
This is Damascus.
Israel is raining bombs on Syria’s capital, targeting civilian neighborhoods and government sites, in one of the oldest cities on Earth — a city that has stood for over 11,000 years. pic.twitter.com/7iPm4WwPZg
— sarah (@sahouraxo) July 16, 2025
सीरिया की सरकारी मीडिया ने स्वास्थ्य मंत्रालय के हवाले से बताया कि इन हमलों में कम से कम एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि 18 लोग घायल हुए हैं।
इधर इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। उनकी गठबंधन सरकार की एक प्रमुख सहयोगी पार्टी ‘शास’ (Shas) ने बुधवार को सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी। इस कदम के बाद नेतन्याहू की सरकार अब संसद (केसेट) में अल्पमत में आ गई है।
इज़रायली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अनिवार्य सैन्य सेवा को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद के चलते शास पार्टी ने यह फैसला लिया। बता दें कि यह विवाद विशेष रूप से अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स समुदाय के युवाओं की सैन्य सेवा से छूट को लेकर है।
इससे पहले सप्ताह की शुरुआत में एक अन्य अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स पार्टी ने भी सरकार से इस्तीफा दे दिया था, जिससे नेतन्याहू की स्थिति और कमजोर हो गई। हालांकि शास पार्टी ने यह स्पष्ट किया है कि वह सरकार से बाहर रहते हुए भी गठबंधन को गिराने का प्रयास नहीं करेगी और कुछ विधेयकों पर सरकार के साथ वोट कर सकती है। पार्टी ने यह भी कहा कि वह संसद भंग करने या सरकार के पतन में सक्रिय भूमिका नहीं निभाएगी।
इस घटनाक्रम के बाद नेतन्याहू की सरकार का भविष्य अनिश्चितताओं से घिर गया है। अल्पमत में होने के चलते अब उन्हें संसद में हर कानून पारित कराने के लिए अन्य दलों के समर्थन की जरूरत होगी, जिससे शासन करना उनके लिए और कठिन हो जाएगा।




