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Caste Census: नेहरू से मोदी और पटेल से राहुल गांधी तक…जानिए इतिहास

A conference on census being addressed by Sardar Vallabhbhai Patel, Deputy Prime Minister of India [Year-1950]

डेस्क: राहुल गांधी और विपक्ष के सबसे बड़े मुद्दे Caste Census की मोदी सरकार ने हवा निकाल दी । सरकार अब जातियों की आबादी जानेगी । लोगों से जाति पूछेगी । जनगणना में जाति का एक कॉलम होगा । जी हां पहलगाम टेरर अटैक के बाद जब पूरा देश मोदी सरकार की कैबिनेट के फैसलों पर नजर गड़ाए हुए था तब आया जाति जनगणना का फैसला । सूचना प्रसारण मंत्री ने उस सवाल का जवाब दिया जिसका इंतज़ार फ़िलहाल देश को नहीं था । धर्म पूछ कर मारे जाने पर होने वाली संभावित कार्रवाई पर पूछा गया तो जवाब मिला जाति का

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राहुल गांधी की Caste Censusकी डिमांड

पिछले कई वर्षों से जाति के सवाल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने वाले राहुल गांधी के लिए राजनीतिक मामलों के कैबिनेट कमेटी का ये फैसला राजनीतिक जीत है या हार ये तो वक्त बताएगा लेकिन ये तय हो गया है कि जिस मुद्दे को लेकर कांग्रेस और उनके साथी राजनीति कर रहे थे उस मुद्दे को पीएम मोदी ने अपना मुद्दा बना दिया है । आने वाले दिनों पहले जाति जनगणना होगी 2026 में डिलिमिटेश और फिर महिला आरक्षण। यानी मोदी सरकार ने इस एक फैसले से आने वाले कई चुनावों को साध लिया । ख़ासतौर से बिहार के चुनाव पर तो इसका बड़ा असर पड़ेगा ।

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मोदी सरकार जाति सर्वे पर साधा निशाना

मोदी सरकार पर ग़ैर बीजेपी शासित राज्यों ने जाति सर्वे करा कर दवाब बनाने की कोशिश की लेकिन कामयाबी हासिल नहीं हो सकी । बिहार, तेलंगना, कर्नाटक जैसे राज्यों के कराए गए जातिगत सर्वे पर भी मोदी सरकार ने निशाना साधा ।

भारत के जाति जनगणना का इतिहास

दरअसल भारत में जातिगत आंकड़ों का संग्रह कोई नया नहीं है — इसकी शुरुआत 1881 में ब्रिटिश काल में हुई थी। ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज की जटिलता को समझने के लिए 1881 से 1931 तक जाति आधारित जनगणनाएं कराईं। 1931 की जनगणना, इस दिशा में आखिरी व्यापक प्रयास थी, जिसमें 4,147 जातियों को रिकॉर्ड किया गया था, जिनमें तथाकथित “अवांछनीय जातियां” या “अछूत” वर्ग भी शामिल थे।

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1951 की जगनगणा में हटी जाति

आज़ादी के बाद परिदृश्य बदल गया। 1951 से भारत सरकार ने पूर्ण जाति आधारित जनगणना बंद कर दी, यह सोचकर कि इससे जातिगत भेदभाव और गहराएगा। इसके बजाय, सरकार ने सिर्फ अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) की ही जानकारी जुटाना और प्रकाशित करना शुरू किया — वो भी संविधान में आरक्षण जैसे सामाजिक न्याय के प्रावधानों के तहत।
आइए इस इतिहास को चरणबद्ध रूप से समझते हैं:

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ब्रिटिश काल (1881-1931)

ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीय समाज की बनावट को समझने के लिए जाति आधारित जनगणनाएं शुरू कीं। 1931 की जनगणना इस सिलसिले की अंतिम कड़ी थी, जिसमें जातियों की संख्या 4,147 दर्ज की गई थी।

1951 से अभी तक जनगणना

जातियों की गिनती बंद की जाए। यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि जातिवाद की जड़ें और मजबूत न हों। तब से केवल SC और ST वर्गों के आंकड़े जुटाए जाते हैं — वो भी सामाजिक उत्थान के लिए।

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1941 की जनगणना में हुई थी कास्ट सेंसस

दिलचस्प बात यह है कि 1941 में भी जाति आधारित जनगणना हुई थी, लेकिन इसके आंकड़े कभी प्रकाशित नहीं किए गए।

A conference on census being addressed by Sardar Vallabhbhai Patel, Deputy Prime Minister of India [Year-1950]

मनमोहन सरकार SECC 2011

2011 में एक बार फिर प्रयास हुआ — ‘सामाजिक, आर्थिक और जाति जनगणना (SECC)’ के ज़रिए। यह 1931 के बाद पहला मौका था जब जातिगत आंकड़े इकट्ठा किए गए। लेकिन इस बार भी सरकार ने डेटा जारी नहीं किया, यह कहते हुए कि इसके ग़लत इस्तेमाल की संभावना है।

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भारत में जातिगत जनगणना का इतिहास गहराई और संवेदनशीलता से भरा हुआ है। यह सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की यात्रा है, जो अपनी पहचान और समानता के बीच संतुलन खोजने की कोशिश कर रहा है।

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