रांची में मिल गया सबूत क्यों है आदिवासियों की भूमि झारखंड, जोड़ा पहाड़ पर हजारों वर्ष पुराने शैल चित्र की हुई खोज 

रांची:  जाने-माने भूवैज्ञानिक नीतीश प्रियदर्शी ने रांची में शैल चित्र की खोज की है। शहर के बीचों -बीच जोड़ा पहाड़ पर एक गुफा मिला है जिसमें हजारों वर्षों पुराने शैल चित्र मिल हैं। जोड़ा पहाड़ी क्षेत्र में हाल ही में हज़ारों साल पुराना प्रागैतिहासिक शैल चित्र खोजा गया है, जो मानव सभ्यता के प्रारंभिक चरणों की झलक पेश करता है। यह खोज उस पहाड़ पर की गई जहां नीतीश प्रियदर्शी  अक्सर अपने अनुसंधान के लिए जाते हैं। लगभग 150 फीट ऊँचाई पर स्थित एक रॉक शेल्टर की सतह पर यह शैल चित्र पाया गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह चित्र ईसा पूर्व पाँच हज़ार से दस हज़ार वर्ष पुराना माना जा रहा है। इसमें कुछ ज्यामितीय रेखाएं और पंजे के छाप शामिल हैं, जिन्हें लाल रंग के ओखर (ochre) पेंट से उकेरा गया है। यह खोज प्राचीन मानव के सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

See also  पिता की गोद में IPL देखने पहुंचा था वैभव सूर्यवंशी, 8 साल बाद 14 की उम्र में तोड़ दिये कई रिकार्ड्स

क्या हैं शैल चित्र?

शैल चित्र या रॉक पेंटिंग वे चित्रकला कृतियाँ हैं, जो प्राचीन या प्रागैतिहासिक काल में पत्थरों या गुफाओं की दीवारों पर उकेरी गई थीं। इनमें चित्रांकन, नक्काशी, उत्कीर्णन, चट्टान व्यवस्था और भूमि चित्रांकन शामिल होते हैं।

रांची में पाए गए शैल चित्रों की विशेषता

  1. प्राचीन जीवन की झलक: ये चित्र प्राचीन जानवरों, औज़ारों और मानवीय गतिविधियों को दर्शाते हैं।
  2. प्रतीकात्मकता: इनमें अक्सर प्रतीकात्मकता होती है, जो तत्कालीन धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को दर्शाती है।
  3. शिकार एवं जीवनशैली: शैल चित्रों से शिकार की विधि और स्थानीय समुदायों के जीवन जीने के तरीकों का पता चलता है।
  4. आदिवासी अनुकरण: आदिवासी समुदाय आज भी इन चित्रों का अनुकरण करके अपने रीति-रिवाज़ों का पालन करते हैं।
  5. कलात्मक विकास: शैल चित्रों से समय के साथ कलात्मक शैलियों के विकास का पता चलता है।

मानव इतिहास की कड़ी जोड़ने में महत्वपूर्ण

प्रागैतिहासिक शैल चित्र मानव विकास की कड़ी को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन चित्रों के अध्ययन से प्रागैतिहासिक मानव के क्रिया-कलाप, रहन-सहन और भोजन की पद्धतियों को समझने में सहायता मिलती है।

See also  बांग्लादेश के प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस का पुतला दहन,हिंदू युवक की कथित हत्या की जांच को लेकर जय श्री राम समिति के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन

विशेषज्ञों की राय

नीतीश प्रियदर्शी  का मानना है कि इस खोज से रांची और उसके आस-पास के क्षेत्रों में प्राचीन मानव सभ्यता के बारे में नई जानकारियाँ मिल सकती हैं। इसके साथ ही, यह खोज पुरातत्वविदों और शोधकर्ताओं के लिए नए शोध के द्वार खोल सकती है।

संरक्षण की आवश्यकता

इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का सुझाव है कि इस शैल चित्र को संरक्षित करने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए ताकि इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को सुरक्षित रखा जा सके।

यह खोज न केवल इतिहास के पन्नों में एक नया अध्याय जोड़ती है, बल्कि यह स्थानीय पर्यटन को भी प्रोत्साहित कर सकती है, जिससे क्षेत्र के सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक पहचान मिलेगी।

WhatsApp Channel Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now

Trending Now