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समझें नीतीश का खेल, 2024 में नहीं देखना चाहते हार का मुंह, 2019 की कामयाबी गंवाना मंजूर नहीं

nitish kumar

बिहार. की राजनीति में गणतंत्र दिवस के दूसरे दिन नीतीश कुमार का महागठबंधन से आजाद होना लगभग तय माना जा रहा है। सियासी गोटियां चली जा चुकी हैं । नीतीश कुमार ने कर्पूरी जयंती के मौके पर परिवारवाद  पर हमला कर अपने लिए रास्ता तो बना लेकिन दिल्ली में बैठे बीजेपी के दिग्गज रणनीतिकार इस बार मत चूको चौहान वाला तीर चलाने वाले हैं ताकि जेडीयू के तीर से हर बार जख्मी होने वाली मोदी की पार्टी इस बार अपनी शर्तों पर बिहार का गेम प्लान कर सके । बड़ा सवाल ये है कि क्या नीतीश कुमार को परिवारवाद को बढ़ावा देने का ख्याल कर्पूरी जयंती के दिन ही क्यों आया । क्या  2022 में जब नीतीश  ने तेजस्वी के साथ मिलकर अपनी सहयोगी पार्टी बीजेपी के साथ खेल खेला था तो उन्हें ये जानकारी नहीं थी कि तेजस्वी और तेज प्रताप यादव किस परिवार से ताल्लुक रखते हैं । क्या उन्हें नहीं मालूम था कि तेजस्वी यादव को उन्होंने उपमुख्यमंत्री इसलिए बनाया था क्योंकि उनके पिता की पार्टी लालू यादव की विधानसभा चुनाव के दौरान सबसे अधिक सीटें आईं ।
नीतीश सब जानते हैं उन्हें राजनीति में पाला बदलने में बेदाग छवि का मदद हर बार मिलता है और इसी अच्छी तरह भुनाने के लिए वे हर बार तैयार रहते हैं । दरअसल सारा खेल 2024 के लोकसभा चुनाव का है । नीतीश कुमार  को राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद बने देश में माहौल का इल्म ना हो इसका अंदाजा ना हो रहा है ये मानने वाली बात नहीं । नीतीश कुमार अच्छी तरह समझ चुके हैं जिस नैया पर बैठकर 2019 में उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने बीजेपी के बराबर 19 सीटें हासिल की थी वो इस बार आरजेडी के साथ मिलकर संभव होता नहीं दिख रहा । लिहाजा हवा का रूख भांपते हुए नीतीश कुमार राम नाम का चोला ओढ़ ले इसमें कोई शक नहीं नजर आता । सियासी दांवपेंच में भी नीतीश कुमार यह चाल कामयाबी की ओर ही जाती हुई दिख रही है ।  रही बात वोटर्स की नाराजगी और उनके नीतीश के प्रति रवैय्ये की तो ऐसा तो है नहीं की नीतीश कुमार ने पाला बदलने का काम पहली बार किया हो । याद कीजिए नीतीश कुमार ने कैसे पटना में मोदी का डिनर कैंसिल कर दिया, हाथ मिलाने से बचते हुए दिखे, वंद मातरम नारों के दौरान चुप रहे, लालू यादव के खिलाफ ‘जंगलराज’ वाली मुहिम में बीजेपी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते रहे और तो फिर इसी बीजेपी को पानी पी-पी कर सांप्रदायिकता के नाम पर विशेष राज्य के दर्जा के नाम पर कोसते भी रहे । और तो और लालू के हाथों मकर संक्रांति के दिन दही का तिलक लगा मुख्यमंत्री पद की शुभकामानाएं तक ले ली । बिहार की जनता सब देख रही है मगर नीतीश कुमार की सियासत जनता के साथ-साथ वोट बैंक का समीकरण भी देखती है, किसके नाराज होने और किसके साथ नहीं होने से उन्हें कितना फायदा होगा इसका पूरा हिसाब उनके पास रहता है । लिहाजा नीतीश कुमार क्या करने वाले हैं और विकल्प क्या है ये दोनों बिहार की समझदार जनता अच्छी तरह जानती । मीडिया इस तमाशे से टीआरपी बटोरने का काम करेगी और नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी की सीटें पक्की करते रहेंगे ।

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