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गुवा गोली कांड : बीएमपी ने अस्पताल में घुस 8 आदिवासियों को भून डाला, बिहार भगाओ का नारा जन्म हुआ और कोल्हान में शिबू सोरेन की एंट्री हुई..पढ़िए कैसे जगन्नाथ मिश्रा ने तीर धनुष पर बैन लगाया

गुवा गोली कांड का इतिहास Gua Firing 1980

गुवा गोली कांडः 8  सितंबर 1980, बिहार संयुक्त था । जगन्नाथ मिश्रा का राज था । बिहारी मिलिट्री पुलिस का खौफ था । शैलेंद्र महतो और भुवनेश्वर महतो समेत कई झारखंड आंदोलनकारियों के एनकाउंडटर की साजिश थी ।  दोपहर के दो बज रहे थे । गुआ के मेन अस्पताल में जंगल के  दावेदार  आंदोलन में गोली,लाठी औ रआंसू गैस के गोली खाकर इलाज के लिए आए आदिवासियों को यकीन ही नहीं हुआ कि इस तरह उन पर हमला होगा । बदले की आग में जल रहे बिहार मिलिट्री पुलिस के जवानों ने गुवा के अस्तपाल के निकाल- निकाल कर आदिवासियों को मारना शुरु कर दिया । एक-एक कर आठ लाशें गिर गईं ।

गुवा अस्पाताल में बीएमपी का आतंक

गुआ अस्पातल में उस वक्त काम करने वाली नर्स बताती हैं कि उनकी आंखों के सामने बीएमपी के जवानों ने रायफल के कुंदे से आदिवासी लड़के को पीटा फिर कनपटी में गोली मार दी । कुल आठ लोग अस्पातल में हुए गोली कांड में मारे गए । तीन आदिवासी गुआ के बाजार में आंदोलन के दौरान गोली के शिकार हुए  । कुल ग्यारह लोगों की मौत हुई ।

गुवा कांड के मृतकों में कई नाबालिग थे

जिस गुवा गोली कांड ने अलग झारखंड राज्य की नींव रखी उसके मृतकों की लिस्ट इस तरह है ।

i) ईश्वर चंद्र सरदार (गांवकैरोम, थानागोइलकेरा)

ii) जूरा पूर्ति (गांवबुण्डू, डाकघरजेटेया, थानाटोंटो)

iii) चैतन चंपिया (गांवबैहाटू, डाकघरगुआ, थानामनोहरपुर)

iv) जीतू सोरेन (गांवजोजोगुटु)

v) बागी देवगम (गांवजोजोगुटु, डाकघर/थानागुआ)

vi) चूड़ी हांसदा (गांवहातनाबेड़ा, डाकघर/थानागुआ)

vii) गंगा हेम्ब्रम (गांवकुरुयाचुरु, थानागुआ)

viii) चांबे रांधा (गांवबड़ा पोंगा, डाकघरचिड़िया, थानागुआ)

ix) चोंदर लगुरी (गांवचुड़गी, डाकघरचिड़िया, थानागुआ)

x) रामो लगुरी (गांवचुड़गी, डाकघरचिड़िया, थानागुआ)

xi) रंगो सोरेन (गांवकुम्बिया, डाकघरचिड़िया, थानागुआ)

कैसे शुरु हुआ सिंहभूम में आंदोलन

चार दशक पुराना वो मंजर जिसे सारंडा के जंगलों के साल का हर वो वृक्ष याद कर कांप जाता है जिसने देखी थी वो फायरिंग । आज का पश्चिमी सिहंभूम और उस वक्त का सिहंभूम के गुवा  कस्बा का मेन अस्पताल  में  बिहार मिलिट्री पुलिस ने  हैवानीयत की सारें हदें पार करते हुए अंग्रेजी शासन के शोषण को पीछे छोड़ दिया ।  पूर्व सांसद और झारखंड आंदोलनकारी शैलेंद्र महतो कहते हैं कि उनकी मांग थी कि जंगल और खान खदानों पर आदिवासियों का हक हो ।  शैलेंद्र महतो ने खुद दस हजार पर्चे बांट कर सिंहभूम के आदिवासों के हक की लड़ाई की शुरुआत की थी ।

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गीता बांटती थी कंपनियां और जंगल पर होता था कब्जा

महान साहित्याकर महाश्वेता देवी उस वक्त अपने लेख में लिखती हैं कि गुवा गोली कांड एक दिन की पुलिसिया बर्बरता की कहानी नहीं थी इसके पीछे थी इस इलाके में टाटा- बिड़ला जैसी तमाम बड़ी कंपनियों द्वारा आदिवासियों के जंगल पर अवैध कब्जे और लोहे के खान से निकले लाल पानी द्वारा उनके खेतों की बर्बादी । बिड़ला आदिवासी इलाकों में मंदिर बनवाती थी और गीता बंटवा कर आदिवासियों की जमीन पर खनन का घँधा करती थी । अपनी आंखों के सामने जंगल लूटते देख आंदोलन धीरे-धीरे तेज होने लगी ।

साल की जगह सागवान लगाने का विरोध

बिहार सरकार ने साल के जंगलों की बजाए सागवान के पेड़ लगाने की योजना शुरु कर दी । हजारों पेट काटे जाने लगे और उनकी जगह सागवान के पेड़ लगाए जाने लगे । सारंडा के जंगलों के साथ आदिवासियों ने इसे बलात्कार माना क्योंकि साल के वृक्षों की वे पूजा करते थे और पत्ते से लेकर लकड़ी तक उनके काम का होता था । सागवान लगाने की योजना ने आदिवासियों में आक्रोश भर दिया ।

गुवा में आयोजित थी बड़ी रैली

आदिवासियों की आजीविका और उनके पशुधन का स्वास्थ्य गंभीर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे बन चुका था । आदिवासियों औऱ मूलवासियों अपनी जमीन के मुआवजे के रूप में नौकरियों की मांग कर रहे थे। 8 सितंबर 1980 को गुवा (पश्चिम सिंहभूम, झारखंड) में एक जनसभा आयोजित की गई थी। प्रशासन को भी इसके बारे में पता था। बड़ी संख्या में लोग, विशेष रूप से सोनुआ, गोईलकेरा और मनोहरपुर ब्लॉक से रैली में भाग लेने वाले थे।

रैली को दबाने की साजिश

जगन्नाथ मिश्रा की सरकार ने रैली को दबाने के लिए बीएमपी (बिहार मिलिट्री पुलिस) को तैनात किया और रेलवे मार्गों पर भी कड़ीनिगरानी रखी जा रही थी और ट्रेनों की जांच की जा रही थी। प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जा रहा था। प्रदर्शनकारी घनेजंगलों से होते हुए उस जगह की ओर बढ़ रहे थे, जहां उनके नेताओं द्वारा रैली को संबोधित किया जाना था। इस रैली के प्रमुख नेताभुवनेश्वर महतो और बहादुर उरांव थे, जो उस जगह पहुंच चुके थे, जहां लोगों को रैली के लिए इकट्ठा होना था। प्रदर्शनकारियों कोगुवा हवाई अड्डे पर इकट्ठा होना था, रैली वहीं से शुरू होनी थी। प्रदर्शनकारी पारंपरिक हथियारों और नगाड़ों के साथ आगे बढ़ रहेथे। बीएमपी को रैली को रोकने के लिए तैनात किया गया था, जब रैली हवाई अड्डे से निकली, तो बीएमपी ने उसे रोकने की धमकीदी और आगे बढ़ने से रोक दिया। लेकिन जंगल आंदोलन के प्रदर्शनकारी नहीं रुके और गुवा के स्थानीय साप्ताहिक बाजार में पहुंचगए। प्रदर्शनकारी साप्ताहिक बाजार में इकट्ठा होने लगे, जहां रैली को इकट्ठा होना था और उनके प्रमुख नेताओं द्वारा संबोधित कियाजाना था।

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रैली में फायरिंग शुरु हुई

नेता जैसे सुखदेव हेम्ब्रम, सिद्धू जमुदा और ललित हेम्ब्रम भी बैठक स्थल पर पहुंच गए। स्थानीय नेता बैसाखू गोप ने सभा कोसंबोधित करना शुरू किया। विरोध शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा था, हालांकि बैसाखू गोप सभा को थोड़ी आक्रामकता से संबोधित कररहे थे। पुलिस आई और भुवनेश्वर महतो को गिरफ्तार कर लिया ताकि संबोधन में बाधा डाली जा सके और भीड़ को तितरबितरकिया जा सके। दूसरी तरफ, भीड़ भुवनेश्वर महतो को पुलिस की पकड़ से छुड़ाने की कोशिश कर रही थी। इसी समय, बैसाखू गोपको भी गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस बहादुर उरांव को भी गिरफ्तार करने की कोशिश कर रही थी। पुलिस के क्रूर व्यवहार केखिलाफ प्रदर्शनकारियों का बढ़ता उत्साह सभा को बेकाबू कर दिया, और पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी और दूसरी तरफप्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर तीरों की बौछार कर दी।

बीएमपी जवानों ने लिया बदला

मौके पर ही तीन प्रदर्शनकारी और तीन बीएमपी जवान मारे गए। बाकी सैनिक अपनी जान बचाने के लिए भाग गए। पुलिस कीगोलीबारी और प्रदर्शनकारियों की मौत की खबर तुरंत लोगों तक पहुंच गई और राज्य में आग की तरह फैल गई। घायल लोगों कोइलाज के लिए गुवा अस्पताल ले जाया गया। राज्य मशीनरी और भी क्रूर हो गई और जामदा से और अधिक पुलिस लाई गई।बीएमपी गुवा अस्पताल पहुंचे और 8 घायल लोगों को कतार में खड़ा करके गोली मार दी।

शवों को परिजनों को नहीं सौंपा

इतना ही नहीं दूसरे दिन बीएमपी के जवानों ने अस्पताल में सैकड़ों तीर भेद दिए ताकि जांच हो तो ये साबित किया जा सके कि आदिवासियों ने उन पर हमला किया था औऱ जवाबी कार्रवाई में उन्होंने गोली चलाई । शैलेंद्र महतो लाइव दैनिक से बातचीत में बताते हैं कि उस दिन उन्हें गुवा में रैली को संबोधित करने आना था लेकिन चाईबासा कोर्ट में उनकी तारीख लगी थी और जैसे ही उन्हें खबर मिली की गोली चल गई है वे बस में बैठकर गुवा पहुंचे । इस दौरान उन्होंने देखा कि ट्रक में आदिवासियों की लाशों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जा रहा है । बाद में आदिवासियों के शवों को नदियों में फेंक दिया गया

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बड़े नेताओं के एनकाउंटर की थी साजिश

सबसे बड़ी बात है कि भुवनेश्वर महतो, शैलेंद्र महतो जैसे उस वक्त के बड़े आंदोलनकारियों को बिहार मिलिट्री पुलिस के जवान एनकाउंटर करने के लिए ढूंढ रहे थे । भुवनेश्वर महतो बताते हैं कि उस वक्त के एसपी और आज के झारखंड के वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव की वजह से शैलेंद्र महतो की जान बच गई । भुवनेश्वर महतो और बैसाखू गोप को गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन पुलिसबहादुर उरांव को गिरफ्तार नहीं कर सकी। भुवनेश्वर महतो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) को पूरी रात पुलिस लॉकअप में रखा गया। बिहारमिलिट्री पुलिस (बीएमपी) ने पुलिस इंस्पेक्टर से भुवनेश्वर महतो का एनकाउंटर करने के लिए लॉकअप की चाबी मांगी, लेकिनइंस्पेक्टर ने उन्हें चाबी नहीं दी। अगले दिन, उन्हें चाईबासा सदर थाना ले जाया गया। बीएमपी ने पुलिस जीप का पीछा किया ताकिरास्ते में भुवनेश्वर महतो का एनकाउंटर किया जा सके। लेकिन पुलिस जीप का ड्राइवर एक आदिवासी था और सिंहभूम में जंगलआंदोलन का समर्थक था, उसने बीएमपी के एनकाउंटर के प्लान को विफल कर दिया और भुवनेश्वर महतो को सुरक्षित ले गया।

कोल्हान में शिबू सोरेन की एंट्री

गुवा गोली कांड के बाद ही कोल्हान में शिबू सोरेन की इंट्री हुई । झारखंड मुक्ति मोर्चा को देशव्यापी पहचान मिली । शुरुआती दौर में दिल्ली की मीडिया ने  आंदोलनकारियों ने मिलिटेंट लिखना शुरु कर दिया । झारखंड आंदोलन की खबरें तक दिल्ली तक नहीं पहुंच पाती थी । फायरिंग के बाद एसपी बने रणधीर वर्मा जिन पर आदिवासियों पर अत्याचार के आरोप लगे । शैलेंद्र महतो बताते हैं कि रणधीर वर्मा और एसडीओ विजय कपूर ने आदिवासियों की धड़ाधड़ गिरफ्तारी शुरु कर दी । उन्हें रात भर पिटा जाता और दिन में उनसे काम कराया जाता ।

जगन्नाथ मिश्रा ने तीर-धनुष पर लगाया बैन

जगन्नाथ मिश्रा ने तीर-धनुष पर बैन लगा दिया । इससे आग और भड़क गई । शिबू सोरेन, शैलेंद्र महतो, एके राय, विनोद बिहारी महतो समेत तमाम नेताओं ने इसका विरोध किया । आखिरकार दिल्ली में इंदिरा गांधी से मुलाकात के बाद तीर -धनुष से पाबंदी हटाई गई । बताया जाता है कि गुवा गोली कांड के बाद ही झारखंड में बिहार भगाओ का नारा लगने लगा । आंदोलन उग्र हो गया और बाहरी-भीतरी की खाई गहरी हो गई ।

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