दुमका। प्रधानमंत्री के मन बात में प्रसिद्ध बटोर चुके झारखंड के दुमका जिले के जरमुंडी प्रखंड के डुमरथर गांव के शिक्षक अब रोग एवं विटामिन युक्त श्री अन्न मिलेट्स की खेती के लिए ग्रामीणों को जागरूक कर रहे हैं। इसके तहत जिले के सुदूर आदिवासी बहुल गांव में अवस्थित डुमरथर उत्क्रमित मध्य विद्यालय में श्री अन्न,(मिलेट्स) की खेती के लिए जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया । कोराना काल में भी डुमरथर विद्यालय के बच्चों के बीच नये तरीके से शिक्षा का अलख जगाये जाने यह गांव समूचे देश में सुर्खियों में आ गया था। विद्यालय के शिक्षकों के इस पहल की समूचे देश में प्रशंसा हुई थी। अब इस विद्धालय के शिक्षकों की पहल पर मडुवा की खेती करके विद्यार्थियों एवं ग्रामीणों को सुपर फूड (मोटे अनाज) के उत्पादन के बारे में जागरूक किया जा रहा है । इसी क्रम में विद्यालय परिसर में मड़ुआ लगाकर छात्रों के साथ समुदाय के लोगों को इसके लगाने की विधि एवं उत्पादन के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा रही है। विद्यालय में लगाए गए मिलेट्स की लहलहाती फसल को देखकर विद्यार्थी एवं समुदाय के लोग काफी उत्साहित होकर जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। इस मौके पर विद्यालय के प्रधानाध्यापक डॉ सपन कुमार ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। जिसमें ज्वार, बाजरा ,मडुवा, कंगनी, कुटकी कोदो ,चीना आदि मिलेट्स के रूप में जाना जाता। जिसे भविष्य का अन्य भी कहा जाता है। उन्होंने कहा कि श्री अन्न अपनाओ- देश निरोगी बनाओ का नारा दिया गया है। उन्होंने कहा कि निरोग रहने के लिए मिलेट्स का उपयोग काफी लाभदायक होता है। पहले के लोग मोटे अनाज उपयोग करते थे तो कम बीमार बीमार नहीं पढ़ते थे। उन्होंने कहा कि 1960 के दशक में हरित क्रांति के नाम पर परंपरागत मोटे अनाज को भोजन से हटा दिया गया और गेहूं एवं चावल को बढ़ावा दिया गया। जानकारों के अनुसार झारखंड प्रदेश में मानसून में लगातार वर्षा कम हो रही है। इस स्थिति में झारखंड में श्री अन्न (मिलेट्स) के उत्पादन की काफी संभावना है। मोटे अनाज मिलेट्स की खेती में कम पानी और कम खर्च में इसका उत्पादन किया जा सकता है । साथ ही मोटे अनाज की फसल को उगाने में किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक तथा कीटनाशक का प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं होती है । साथ ही इसके अवशेष का भी पशुओं के चारा के रूप में उपयोग किया जाता है जिससे पर्यावरण प्रदूषण की समस्या नही होती है। गेहूं के अवशेष पराली से पर्यावरण प्रदूषण काफी होता है। दिल्ली में इसका असर सबसे अधिक देखने को मिलता है। डाक्टर सपन बताते हैं कि कोराना काल के बाद से मोटे अनाज को यूनिटी बूस्टर के रूप में भी जाना जाता हैं। इसे सुपर फूड भी कहा जाता है । मोटे अनाज में कैल्शियम, आयरन, जिंक, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, पोटेशियम, फाइबर, विटामिन आदि भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इससे थायराइड की समस्या यूरिक एसिड, किडनी ,लीवर, लिपिड रोग, अग्नाशय से संबंधित रोग, गैस, कब्ज से मुक्ति मिलती है। उन्होंने कहा कि यह गेहूं और चावल से बेहतर अनाज है। 60 के दशक के पूर्व भारत में घर-घर में इसका उपयोग किया जाता था । इससे पूर्व हर घर में बच्चों को दादी और मां के हाथों मोटे अनाज मिलेट्स खाने को मिलता था। लेकिन वर्तमान में खेतों से गायब होने के साथ थाली से भी गायब हो गया है। इसलिए ग्रामीण क्षेत्र में मिलेट्स को लेकर जागरूकता लाने का प्रयास किया गया है। ग्रामीणों ने इस जागरूकता अभियान के क्रम में अपनी खेतों में इसे उगने का संकल्प लिया। भारत सरकार द्वारा भी श्री अन्न,मोटे अनाज( मिलेट्स )की खेतों को लेकर विभिन्न माध्यमों से जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। वहीं झारखंड सरकार द्वारा राज्य के सभी सरकारी विद्यालय में भी मडुवा (मिलेट्स) के लड्डू का उपयोग शुरू किया गया है।



