रांचीः झारखंड के निर्माता और दिशोम गुरु शिबू सोरेन की धर्मपत्नी रूपी सोरेन का बुधवार की रात रांची के निजी अस्पताल में निधन हो गया। झारखंड आंदोलन के प्रणेता शिबू सोरेन की जीवनसंगगिनी रूपी सोरेन का संपूर्ण जीवन संघर्ष, त्याग और सेवा की मिसाल रहा है। झारखंड के चांडिल क्षेत्र अंतर्गत कांगलाडीह-धातकीडीह गांव की रूपी सोरेन का विवाह वर्ष 1962 में शिबू सोरेन से हुआ था। जब शिबू सोरेन अलग राज्य और आदिवासी अधिकारों की लड़ाई में दिन-रात सक्रिय थे, तब रूपी सोरेन ने घर-परिवार की पूरी कमान संभालते हुए बच्चों को उच्च संस्कार, शिक्षा और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाया। परिवार में उनकी चार संतोनें, स्वर्गीय दुर्गा सोरेन, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन और अंजलि सोरेन हुई। शिबू सोरेन को जब पद्यभूषण सम्मान दिया गया, तो राष्ट्रपति द्रौपर्दी मुर्मू से यह सम्मान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में रूपी सोरेन ने ही ग्रहण किया था। यह क्षण झारखंड आंदोलन और आदिवासी अधिकारों की लड़ाई को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देनेवाला था।
1 जनवरी 1962 को शिबू सोरेन के साथ विवाह के बाद शुरू हुई संघर्षपूर्ण यात्रा
शहीद सोबरन सोरेन के पुत्र शिबू सोरेन के साथ 1 जनवरी 1962 को परिणय सूत्र में बंधने के बाद रूपी सोरेन का जीवन केवल एक परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रहा। जिस दौर में शिबू सोरेन शोषितों, वंचितों और आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए गांवों, जंगलों और जेलों के बीच संघर्ष कर रहे थे, उस समय रूपी सोरेन ने विषम परिस्थितियों में घर-परिवार की पूरी जिम्मेदारी संभाली।
उन्होंने अपने बच्चों—स्वर्गीय दुर्गा सोरेन, अंजली, हेमंत और बसंत—को मजबूत संस्कार दिए और उन्हें शिक्षा के साथ संघर्ष की समझ भी दी। यही संस्कार आगे चलकर परिवार के कई सदस्यों को सार्वजनिक जीवन और नेतृत्व की राह तक ले गए।

रूपी सोरेन के जीवन में दुखों की कमी नहीं रही। वर्ष 2009 में बड़े पुत्र दुर्गा सोरेन के असामयिक निधन का गहरा आघात उन्हें सहना पड़ा। इसके बाद वर्ष 2025 में जीवनसाथी और झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेता शिबू सोरेन के निधन ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसके बावजूद उन्होंने धैर्य और दृढ़ता का दामन नहीं छोड़ा।
वर्ष 2026 में दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों यह सम्मान ग्रहण करने का अवसर रूपी सोरेन को मिला। वह क्षण केवल सोरेन परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे झारखंड के लिए गौरव का पल बन गया।
माटी से जुड़ा रहा गहरा रिश्ता
रूपी सोरेन का जीवन जितना संघर्षों से जुड़ा था, उतना ही अपनी मिट्टी और परंपराओं से भी। त्योहारों और पारिवारिक अनुष्ठानों के दौरान चांडिल के धातकीडीह से उनका जुड़ाव हमेशा बना रहा। सादगी, सहजता और पारिवारिक मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा उनके व्यक्तित्व की पहचान रही।





