रांचीः झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दो दिवसीय असम दौरे से लौटकर रांची आ गये है। हेमंत सोरेन के असम दौरे के बाद उत्तर–पूर्व की राजनीति में नए समीकरण बनने के संकेत मिल रहे हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की असम में सक्रियता ने इस राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया है।हेमंत सोरेन ने मंगलवार को बिस्वनाथ जिले के मिजिका चाय बागान में आयोजित एक बड़ी रैली में न केवल वहां की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला, बल्कि आदिवासी और दलित समुदायों को एकजुट होकर राजनीतिक शक्ति बनने का आह्वान भी किया।इस कार्यक्रम के साथ ही झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और जय भारत पार्टी के बीच औपचारिक राजनीतिक गठबंधन की घोषणा ने चुनावी समीकरणों को नया आयाम दे दिया है।
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जय भारत पार्टी से गठबंधन करेगी झामुमो
रैली में जय भारत पार्टी ने झामुमो संग आगामी चुनाव में मिलकर मैदान में उतरने का ऐलान किया। गठबंधन की रणनीति के तहत राज्य की लगभग 40 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी की जा रही है। यह रणनीति मुख्य रूप से उन इलाकों पर केंद्रित बताई जा रही है, जहां चाय बागान श्रमिकों और आदिवासी समुदाय का प्रभाव निर्णायक है।असम में चाय बागान से जुड़े आदिवासी समुदाय करीब 30–35 विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में यह गठबंधन इन सीटों पर तीसरे मोर्चा के रूप में उभरने की कोशिश कर रहा है।
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BJP का वर्चस्व तोड़ने की रणनीति
अपने भाषण में हेमंत सोरेन ने सीधे तौर पर भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि राजनीति केवल एक दल की जागीर नहीं है। आदिवासी और दलित समाज अब राजनीतिक रूप से जागरूक हो चुका है और अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष करेगा।यह केवल चुनावी बयानबाजी नहीं बल्कि भाजपा के उस मजबूत संगठनात्मक ढांचे को चुनौती देने की कोशिश भी माना जा रहा है, जिसने पिछले एक दशक में असम में अपनी पकड़ मजबूत की है।उन्होंने असम की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले चाय उद्योग को आदिवासी अस्मिता से जोड़ने की कोशिश की। कहा कि चाय बागान का पूरा ढांचा आदिवासी श्रमिकों के श्रम पर टिका है, इसलिए उनके अधिकार और सम्मान की अनदेखी नहीं की जा सकती।
70 लाख है चाय बागान श्रमिकों की आबादी
असम में चाय बागान श्रमिकों की आबादी करीब 70 लाख मानी जाती है, जिनमें बड़ी संख्या उन समुदायों की है जिनकी जड़ें झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से जुड़ी हैं। यही कारण है कि हेमंत सोरेन का संदेश इन समुदायों तक भावनात्मक रूप से पहुंचने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।हेमंत सोरेन ने रसोई गैस की बढ़ती कीमतों और महंगाई का मुद्दा भी उठाया। उनका आरोप था कि आर्थिक नीतियों के कारण गरीब और मध्यम वर्ग की स्थिति कठिन होती जा रही है।चुनावी रणनीति के लिहाज से यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि असम में ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के मतदाता महंगाई को एक प्रमुख मुद्दे के रूप में देखते हैं।
अभी तक भाजपा-कांग्रेस में मुकाबला, बदलेगा चुनावी परिदृश्य
असम में अब तक मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच रहा है। हालांकि क्षेत्रीय दलों और छोटे गठबंधनों की मौजूदगी भी समय–समय पर चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती रही है।गठबंधन यदि चाय बागान क्षेत्रों में प्रभावी जनसमर्थन जुटाने में सफल रहता है तो कई सीटों पर वोटों का बंटवारा सीन बदल सकता है। इससे सीधे तौर पर भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती पैदा हो सकती है।हेमंत सोरेन की असम में सक्रियता केवल एक राज्य के चुनाव तक सीमित नहीं है। यह देश में सशक्त आदिवासी नेतृत्वकर्ता के तौर पर उभरे हेमंत सोरेन को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होने का बड़ा मौका है। यह प्रयोग सफल रहता है तो उत्तर–पूर्व के अन्य राज्यों में भी समान सामाजिक आधार वाली राजनीति को नई दिशा मिल सकती है।





































































































