गदर से पहले हुआ था हूल जोहार, साल के तीन पत्ते और सिदो-कानो के गुप्त संदेश ने हिला दीं ईस्ट इंडिया कंपनी की जड़ें

sido kano

हूल दिवस पर विशेष: असाढ़ का महीना था, साल था 1855 का । जगह थी बराकर नदी के किनारे नारायणपुर के जमींदार का महल । 30 जून को हूल के आगाज के बाद संतालों ने अपनी आजादी के लिए हर कीमत वसूलने की तैयारी की थी । रास्ते में जो आया उसका हस्र ऐसा रोंगटे खड़ा करने वाला था। नारायणपुर के एक सूदखोर जमींदार पर जब हमला हुआ तो संताल गुस्से में बोले…

घुटने तक दोनों पैर काटे गए

जमींदार चीखा

संताल चिल्लाए

चार आना

जांघ तक दोनों पैर काटे गए

उसकी चीख निकली

संताल जोर से बोले

आठ आना

दोनों हाथ काटे गए

जमींदार और चिल्लाया

संताल और जोर से बोले

बारह आना

और आखिर में सिर धड़

से अलग हुआ

संताल जश्न मनाते हुए

चिल्लाने लगे

फरकट्टी! फरकट्टी

हूल आंदोलन की कहानी

1855 का हूल जितना अंग्रेजों के खिलाफ था उससे कहीं ज्यादा जमींदारों,साहूकारों, सूदखोरों के खिलाफ था । अमन पसंद संतालों को दशकों तक किस अत्याचार का सामना करना पड़ा होगा जिससे उनमें इतना आक्रोश और नफरत भर गया था की संताल परगना के सैकड़ों किलोमीटर के दायरे में जितने भी जमींदार, साहूकार,सूदखोर थे उनका खात्मा होने लगा । नारायणपुर के जमींदार को संतालों ने जिस नफरत से मारा उससे अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि आजादी के लिए संताल किसी भी हद जाने के लिए तैयार थे ।

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संतालों ने जब  जमींदार के टुकड़े किए

स्टोरी ऑफ इंडिया अपलैंड में एक और जमींदार की मौत की कहानी सुन रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आदिवासियों का शोषण करने वाले इस जमींदार ने संतालों से बचने के लिए पानी की टंकी में पनाह ली लेकिन संतालों को मालूम चल गया।जमींदार के सिर में इतने तीर लगे की उसका चेहरा तक नजर नहीं आने लगा । इसके बाद विद्रोहियों ने अत्याचारी जमींदार के 24 टुकड़े कर फेंक दिया ।

अंग्रेजों और साहूकारों के खिलाफ हूल

करीब पौने दो सौ साल बाद इस कहानी का जिक्र करना इसलिए जरुरी है क्योंकि आजादी तो मिली तो लेकिन आज भी संताल परगना कहीं ना कहीं शोषण के जाल में फंसा है । चाहे वो शोषण सरकारी हो या फिर राजनीतिक । संतालों का हूल एक दो दिनों के शोषण का नतीजा नहीं था । दशकों से चली आ रही दासता और शोषण के खिलाफ सबसे बड़ी जंग थी । अंग्रेजों ने अपने पांव दमन ए खोह यानी संताल परगना में जैसे ही फैलाना शुरु किया वैसे ही उस वक्त के सवर्ण हिन्दुओं की चांदी हो गई । अंग्रेजों के पिछलग्गू बन कर उन्होंने जिस तरह से लगान वसूलना शुरु किया उसकी परिणिति 1855 में दिखी ।

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इस तरह साहूकार संतालों को ठगते थे

सुनी-सुनाई बात नहीं है, दस्तावेजी सबूत है । संताल घी लेकर आते थे और ‘वे’ (सूदखोर,साहूकार,सेठ) फर्जी पेंदी वाले बर्तन में माप कर ठग लेते थे।  वे जंगल से चावल लाते थे और बदले में तेल, नमक लेते थे मगर वे संतालों-आदिवासियों के सामान को उस पलड़े में तौलते थे जो वजन कम दिखाता था और खुद जो सामान देते उसके पलड़े में भारी दिखने का इंतजाम होता था । अगर संताल विरोध करते थे समाझाया जाता कि नमक पर टैक्स लगता है उसका वजन अलग होता है ।

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संतालों की पीढ़ियां बन जाती थीं कर्जदार

जंगल साफ कर खेत बनाते और जैसे ही फसल दिखती वे आते और कब्जा कर लेते, थोड़े अनाज देते और हमेशा के लिए कर्जदार बना डालते, पीढ़ियां कर्ज नहीं उतार पाती। विरोध करने, भागने पर राजा,जमींदार के पास मुकदमा चलता और फिर वे जीत जाते । जमीन उनकी हो जाती । संताल को उतनी ही अनाज मिलता जीतने से उनकी भूख से मौत ना हो जाए। अंग्रेज जजों को टैक्स वसूलने से फुर्सत नहीं थी , संताल कहते थे ईश्वर महान है लेकिन वो हमसे बहुत दूर है ।

33 प्रतिशत लिया जाता था ब्याज

इधर संताल परगना के जंगल धड़ाधड़ साफ हो रहे थे, जंगल काट खेती लायक जमीन तैयार हो रही थी ताकि ज्यादा से ज्यादा भूमि पर कर वसूली किया जा सके । इधर वे यानी साहूकार संतालियों का हर तरह से शोषण कर रहे थे, पिता की मौत हो गई तो संताली को साहूकार के दरवाजे पर खुद और अपने बच्चों को गिरवी रखनी होती थी बदले में चांदी के चंद सिक्के मिलते जो काम क्रिया में खत्म हो जाते ।इसके बाद कर्ज 33 फीसदी के ब्याज दर से चंद आने से बढ़ते बढ़ते सैकड़ों रुपए हो जाते लेकिन ना कभी कर्ज अदा होता और ना ही कभी दासता से आजादी मिलती ।

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अंग्रजों की गोली से डरते नहीं थे संताल

एक अंग्रेज अधिकारी कैप्टन आर डी मैकडोनल्ड ने 21 अगस्त 1855 की घटना का जिक्र कहुए लिखा ” हमें हर उस गांव में जाने का हुक्म था जहां से धुआं उठ रहा था, ऐसे ही गांव में हम पहुंचे तो मिट्टी के एक घर में कुछ लोग छुपे हुए थे । हमने घर को चारों ओर से घेर लिया और सरेंडर करने के लिए कहा लेकिन दरवाजा थोड़ा खुला और तीरों की बौछार हमारे ऊपर हुई,हमने गोली चलाई, फिर हमने सरेंडर के लिए कहा, फिर दरवाजा खुला  और तीरों की बरसात हुई , ऐसा बहुत देर तक चलता रहा, जब अंदर से तीर आने बंद हुए तो हमने एक सिपाही को भेजा, अंदर लाशें पड़ीं थी, एक बुजुर्ग जिंदा था, हमने उसे हथियार फेंकने के लिए कहा लेकिन वो उठा और कुल्हाड़ी से हमारे सिपाही पर वार कर दिया, हमने गोली चलाई वो गिर गया । ”

 

सिदो-कानो ने

सन सत्तावन से पहले की ये क्रांति दुनिया में किसी भी क्रांति से कमतर नहीं है जहां अपनी आजादी के लिए, दासता और पशुता के खिलाफ संतालों ने ये जानते हुए कि गोलियों के आगे उनका तीर कमजोर पड़ जाएगा अपनी आहूती दे दी । इतिहास ने संतालों के साथ उस वक्त भी नाइंसाफी की और आज भी वो नाइंसाफी जारी है ।

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