वंदे मातरम: आनंदमठ में बंकिमचंद्र रचित राष्ट्रगीत का सफरनामा…रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर एआर रहमान तक

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December 8, 2025

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वंदेमातर गीत की शुरुआत

गीत ‘आनंदमठ’ उपन्यास में ही सीमित था, जब तक कि 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बेडन स्क्वायर अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे नहीं गाया। इसके बाद यह एक परंपरा बन गई और आज भी कांग्रेस अधिवेशनों, लोकसभा और विधानसभा के सत्रों की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ के प्रथम अंतरे के पाठ से होती है।

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में कोलकाता के टाउन हॉल में भारी भीड़ एकत्र हुई और भीड़ में से किसी ने “वंदे मातरम्” का नारा लगाया। यह नारा रातों-रात अत्यंत लोकप्रिय हो गया। यह बंगाल की सीमाओं को पार कर पूरे देश में आग की तरह फैल गया। शीघ्र ही ब्रिटिश शासन ने इस गीत और “वंदे मातरम्” के नारे पर प्रतिबंध लगा दिया।

वंदेमातरम की पहली रिकॉर्डिंग

इस गीत की लोकप्रियता को देखते हुए एच. बोस रिकॉर्ड्स और निकोल रिकॉर्ड कंपनी ने इसे रवींद्रनाथ ठाकुर, बाबू सुरेंद्रनाथ बनर्जी, सत्यभूषण गुप्त, आर.एन. बोस आदि की आवाज़ों में रिकॉर्ड किया। हेमेंद्र मोहन बोस ने 1907 में इसे व्यावसायिक रूप से एच. बोस रिकॉर्ड्स पर जारी किया। पुलिस ने फैक्ट्री और रिकॉर्ड नष्ट कर दिए। फिर भी कुछ प्रतियां बेल्जियम और पेरिस में बच गईं (जहां ये रिकॉर्ड प्रेस किए गए थे)। इस प्रकार आज हम रवींद्रनाथ ठाकुर की आवाज़ में “वंदे मातरम्” सुन सकते हैं। उन्होंने इसे बहुत ऊँचे, तीखे, कुछ नासिका-स्वर वाले और अत्यंत धीमे लय में गाया है। यह ग्रामोफोन रिकॉर्ड पर उपलब्ध सबसे पुरानी रिकॉर्डिंग है। अब यह सीडी पर पुस्तक ‘रवींद्रनाथ टैगोर – फैसेट्स ऑफ ए जीनियस’ के साथ 1999 में आकाशवाणी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई है।

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 स्वतंत्रता-पूर्व काल

प्रतिबंध के कारण यह गीत और भी अधिक लोकप्रिय हो गया तथा प्रेरणा का स्रोत बन गया। “वंदे मातरम्” को ‘वैदिक मंत्र’ जैसा दर्जा प्राप्त हुआ और यह क्रांतिकारियों का नारा बन गया। पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने कई वर्षों तक कांग्रेस अधिवेशनों में इसे राग काफ़ी में गाया। 1931 में उनके निधन के बाद पं. ओंकारनाथ ठाकुर ने इसे उस राग में गाना शुरू किया, जिसे उन्होंने ‘बंगीय काफ़ी’ कहा। पलुस्कर ने कोई ग्रामोफोन रिकॉर्ड नहीं बनाया, लेकिन ओंकारनाथ ठाकुर की व्यावसायिक रिकॉर्डिंग उपलब्ध है, जिसमें उन्होंने इसे बहुत धीमे लय में केवल तानपुरे की गंभीर ध्वनि के साथ गाया है।

राजनीतिक संगठनों के अलावा बंगाल और महाराष्ट्र के कई संगीतकारों और गायकों ने इसे मातृभूमि के प्रति भक्ति व्यक्त करने वाला श्रेष्ठ गीत माना। 1928 के आसपास विष्णुपंत पागनीस ने इसे राग सारंग में रिकॉर्ड किया। 1910-12 के बीच मुंबई के भजन गायक सावरलाराव ने इसे राग कलिंगड़ा में गाया, जिसकी प्रस्तुति अत्यंत भावपूर्ण थी। केशवराव भोले ने 1935 में राग देशकार में ओडिओन रिकॉर्ड बनाया।

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बंगाल के कई कलाकारों—देश दास, सत्यभूषण गुप्त, दिलीपकुमार राय, भवानीचरन दास, हेमचंद्र सेन, हरेंद्रनाथ दत्त—ने अलग-अलग धुनों में इसे रिकॉर्ड किया। दक्षिण भारत में डी. वसंत और डी. विमला ने भी रिकॉर्ड किए, जो अब उपलब्ध नहीं हैं। एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी ने इसे दिलीपकुमार राय के साथ युगल गीत के रूप में गाया तथा तमिल अनुवाद भी गाया। गीता दत्त ने जी.एम. दुर्रानी के साथ इसका युगल गान किया।

कोरस / ऑर्केस्ट्रल “वंदे मातरम्”

कई सामूहिक और वाद्य रूपांतर रिकॉर्ड किए गए। सुभाषचंद्र बोस के सुझाव पर तिमिर बरन ने इसे राग दुर्गा में मार्चिंग शैली में ढाला, जिसे आज़ाद हिंद सेना की परेडों में बजाया गया।

कई संगीतकारों को विश्वास था कि यही स्वतंत्र भारत का राष्ट्रगान बनेगा। मास्टर कृष्णराव फुलांब्रिकर और वी.डी. अंभैकर ने इसके लिए विशेष धुनें बनाई। मौलिक रिकॉर्ड संविधान समिति के सामने प्रस्तुत किए गए। हालांकि पंडित नेहरू ने इन प्रयासों को अस्वीकार कर दिया।

24 जनवरी 1950 को संविधान समिति की बैठक में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि “जन गण मन” भारत का राष्ट्रगान होगा और “वंदे मातरम्” को राष्ट्रगीत का वही दर्जा दिया जाएगा। इसके साथ ही इन सभी प्रयासों का अंत हुआ और ये रिकॉर्ड सांस्कृतिक धरोहर बन गए।

स्वतंत्रता के बाद का युग

1947 में यह गीत फिल्म ‘अमर आशा’ में शामिल हुआ। 1951 में फिल्म ‘आंदोलन’ और 1952 में फिल्म ‘आनंदमठ’ में यह अत्यंत लोकप्रिय हुआ। विभिन्न फिल्मों और रिकॉर्डों में इसके कई रूप सामने आए।

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आकाशवाणी के लगभग 800 केंद्रों के लिए विशेष रिकॉर्ड तैयार किए गए। माना जाता है कि इसकी धुन रवि शंकर ने निर्धारित की थी। हर सुबह रेडियो स्टेशन “वंदे मातरम्” का प्रसारण करते हैं। संसद और विधानसभाओं के उद्घाटन सत्र में भी इसका गायन होता है। नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे सम्मान में सावधान मुद्रा में खड़े हों।

 स्वर्ण जयंती और “वंदे मातरम्”

1997 में स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती पर ए.आर. रहमान का एल्बम “वंदे मातरम् – माँ तुझे सलाम” जारी हुआ। यह अत्यंत लोकप्रिय हुआ, पर इसकी प्रस्तुति और राष्ट्रीय ध्वज के व्यवहार को लेकर विवाद भी हुए।

14 अगस्त 1997 की मध्यरात्रि को इंडिया गेट पर इसका आयोजन हुआ। उसी समय संसद का विशेष सत्र चल रहा था, जहां पं. भीमसेन जोशी ने इसे शास्त्रीय शैली में प्रस्तुत किया। अगले वर्ष पं. जसराज ने भी इसका गायन किया। सांसदों द्वारा तालियाँ बजाना इस बात पर प्रश्नचिह्न लगाता है कि हम अपने राष्ट्रगीत को कितना सम्मान देते हैं।

आज भी यह बहस जारी है कि “वंदे मातरम्” को राष्ट्रगान का पूर्ण दर्जा मिले या नहीं, और कुछ कट्टरपंथी इसे “हिंदू राष्ट्र” का गान भी बनाना चाहते हैं।

वंदे मातरम गीत के 125 वर्ष होने पर ‘द सोसाइटी ऑफ इंडियन रिकॉर्ड कलेक्टर्स’ के संपादक सुरेश चंदवनकर  द्वारा लिखित लेख से साभार

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