रांचीः केंद्र सरकार द्वारा लागू किये गये खनिज संशोधन विधेयक को राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। इस मामले में विधि विभाग से राय लेकर खान विभाग ने संचिता सीएम की मंजूरी के लिए भेज दी है।
सीएम से मंजूरी मिलते ही खान विभाग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी जायेगी। इसके चुनौती देने से संबंधित मामले में विभागीय मंत्री के रूप में सीएम ने सहमति दी थी। इसके बाद विधि विशेषज्ञों से राय ली गयी। अब पुनः मुख्यमंत्री के पास अंतिम मंजूरी के लिए संचिका भेजी गयी है। बताया गया कि प्रस्ताव में सुप्रीम कोर्ट द्वारा खनिजों पर सेस वसूली का अधिकार दिये जाने के आदेश को ही आधार बनाया गया है। राज्य सरकार का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही वर्ष 2024 में खनिजों पर सेस, लगाकर राज्य सरकार ने इसकी वसूली शुरू की थी, जिसे केंद्र सरकार के विधेयक के जरिये समाप्त किया जा रहा है। इससे राज्य को भारी नुकसान होगा और विकास योजनाएं प्रभावित होंगी। सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को केंद्र सरकार के पास राज्य में समाप्त करने का अधिकार नहीं है। राज्य सरकार का तर्क है कि अधिनियम को संशोधित कर धारा-9डी को जोड़ने से झारखंड जैसे खनिज संपदा राज्यों को भारी नुकसान का सामन करना पड़ेगा।
14 हजार करोड़ के राजस्व का दावा
राज्य सरकार का अनुमान है कि खनिज सेस से वित्तीय वर्ष 2026-27 में करीब 14,000 करोड़ रुपए का राजस्व मिल सकता था।सरकार का कहना है कि संशोधित कानून लागू होने से राज्य इस अनुमानित राजस्व से वंचित हो सकता है। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर भी करीब 14,000 करोड़ रुपए के संभावित राजस्व नुकसान की बात कह चुके हैं।


1.36 लाख करोड़ की बकाया राशि का भी मुद्दा
राज्य सरकार ने विभिन्न कोयला कंपनियों से बकाया राशि का मुद्दा भी उठाया है।सरकार के अनुसार, कोल कंपनियों के पास झारखंड की करीब 1,36,042 करोड़ रुपए की बकाया राशि है। राज्य का तर्क है कि संशोधित कानून के कारण इस राशि की वसूली के उसके दावे पर भी असर पड़ेगा।
18 अगस्त से लागू हुआ संशोधित कानून
केंद्र के संशोधित कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी 18 अगस्त 2026 को मिली थी। इसके बाद यह कानून लागू हो गया। इसमें राज्यों द्वारा खनिजों पर अतिरिक्त कर या सेस लगाने से संबंधित प्रावधानों को सीमित किया गया है। राज्य सरकार का कहना है कि उसने फिलहाल झारखंड में इस संशोधन को लागू नहीं किया है और कोल इंडिया समेत अन्य कंपनियां सेस का भुगतान कर रही हैं। सरकार अब इस पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाने की तैयारी में है।





