चाय-बिस्कुट घर ले जाने पर चपरासी की बर्खास्तगी ‘असंवेदनशील’, झारखंड हाई कोर्ट ने दिया नौकरी बहाली का आदेश

Picture of Live Dainik

Live Dainik

June 28, 2026

चाय-बिस्कुट घर ले जाने पर चपरासी की बर्खास्तगी 'असंवेदनशील', झारखंड हाई कोर्ट ने दिया नौकरी बहाली का आदेश

रांची:झारखंड उच्च न्यायालय ने एक बेहद संवेदनशील फैसला सुनाते हुए एक संविदा कर्मी (चपरासी) की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (DRDA), बोकारो में कार्यरत चपरासी रंजीत कुमार हिमांशु को सेवा में बहाल करने और उन्हें 50% पिछला वेतन (बैक वेजेस) देने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनाक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए प्रशासन के रवैये पर कड़ी टिप्पणी की और इसे “असंवेदनशीलता से भरा अन्याय” करार दिया।
क्या था पूरा मामला?
बोकारो निवासी रंजीत कुमार हिमांशु को 31 दिसंबर 2005 को DRDA बोकारो में संविदा के आधार पर चपरासी के पद पर नियुक्त किया गया था। लगभग 17 वर्षों की सेवा के बाद, 16 मार्च 2022 को उप विकास आयुक्त (DDC), बोकारो द्वारा उन्हें एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। नोटिस में बेहद अस्पष्ट रूप से कहा गया था कि कार्यालय से “कुछ सामग्री” गायब हुई है, जिसे रंजीत अपने घर ले गए थे। हालांकि, नोटिस में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि वह सामग्री क्या थी। बाद में यह बात सामने आई कि वह सामग्री मात्र चाय पत्ती (चाय पाउडर) और बिस्कुट थी।
इस नोटिस के बाद, 2 मई 2022 को प्रशासन ने एक संक्षिप्त और बिना किसी ठोस कारण वाला आदेश जारी कर रंजीत की सेवाएं समाप्त कर दी थीं। इसके खिलाफ दायर याचिका को सिंगल जज बेंच ने भी खारिज कर दिया था, जिसके बाद रंजीत ने खंडपीठ के समक्ष एलपीए (LPA No. 185 of 2026) दाखिल किया।
हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां
खंडपीठ ने मामले की गंभीरता और प्रशासन की संवेदनहीनता को देखते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कहीं:
अस्पष्ट नोटिस और प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन:* कोर्ट ने कहा कि अस्पष्ट कारण बताओ नोटिस जारी करना ‘बिना नोटिस’ के समान है। प्रशासन ने रंजीत के 17 साल के बेदाग सेवा रिकॉर्ड और उनके पूर्व अधिकारियों द्वारा दिए गए ‘उत्कृष्ट कार्य’ के प्रमाणपत्रों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।
क्रूर और असंगत सजा:* अदालत ने कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि चपरासी ने घर पर चाय-बिस्कुट ले जाने की गलती की थी, तो भी 17 साल की सेवा के बाद सीधे नौकरी से निकाल देना पूरी तरह से असंगत है और “आत्मा को झकझोर देने वाला” है। कोर्ट ने कहा, “यह दया के साथ किया गया न्याय नहीं, बल्कि असंवेदनशीलता से भरा अन्याय है।”
परिवार की लाचारी को अनदेखा किया:* रंजीत ने अपने जवाब में बताया था कि उनकी मामूली तनख्वाह पर उनकी पत्नी, तीन बेटियों और एक छोटी बहन सहित छह लोगों का परिवार निर्भर है। कोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी आदेश जारी करते समय इस मानवीय पक्ष पर न्यूनतम विचार भी नहीं किया गया।
कोर्ट का सख्त निर्देश: 1 जुलाई तक बहाल करें
एक गरीब चपरासी पिछले चार साल से नौकरी से बाहर है। हम केवल अंदाजा ही लगा सकते हैं कि उस पर और उसके परिवार पर क्या गुजरी होगी, सिर्फ इसलिए कि उनका पिता बच्चों को खिलाने के लिए कार्यालय से कुछ चाय और बिस्कुट घर ले आया था।”
झारखंड हाई कोर्ट*
हाई कोर्ट ने सिंगल जज के फैसले को पलटते हुए निम्नलिखित आदेश जारी किए हैं:
तत्काल बहाली:* रंजीत कुमार हिमांशु को 1 जुलाई 2026 तक हर हाल में सेवा में बहाल किया जाए।
50% बैक वेजेस:* उन्हें पिछले चार साल का 50% बकाया वेतन 31 जुलाई 2026 तक भुगतान किया जाए। बाकी का 50% वेतन कटना ही उनकी कथित गलती के लिए पर्याप्त सजा है।
निजी जिम्मेदारी:* उपायुक्त (DC) बोकारो और उप विकास आयुक्त (DDC) बोकारो को व्यक्तिगत रूप से इस आदेश का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है। DC बोकारो को बहाली के संबंध में 10 जुलाई 2026 तक और वेतन भुगतान के संबंध में 10 अगस्त 2026 तक अदालत में अनुपालन हलफनामा (Compliance Affidavit) दायर करना होगा।

See also  देवघर कोषागार में अवैध निकासी का मामला, सारवां थाने में प्राथमिकी दर्ज
WhatsApp Channel Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now

Trending Now